*अद्भुत! काशी का वो थाना जहाँ ‘इंसान’ नहीं, साक्षात ‘काल भैरव’ हैं थानेदार; खाली रहती है कुर्सी, बगल में बैठते हैं थानेदार*

*बाबा काल भैरव पर वाराणसी से मनोज आनंद की खास रिपोर्ट*
मनोज आनंद /वाराणसी | 06 फरवरी, 2026 :: धर्म और आध्यात्म की नगरी काशी (वाराणसी) अपनी प्राचीन परंपराओं के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ एक ऐसी अनूठी परंपरा आज भी जीवित है, जो आधुनिक पुलिसिंग और अटूट श्रद्धा के मिलन का प्रतीक है। वाराणसी के विश्वेश्वरगंज स्थित कोतवाली पुलिस स्टेशन में पिछले कई दशकों से थानेदार की मुख्य कुर्सी पर कोई पुलिस अधिकारी नहीं बैठता। उस कुर्सी पर साक्षात ‘काशी के कोतवाल’ बाबा काल भैरव का आधिपत्य माना जाता है।

*कुर्सी पर बाबा का आसन, बगल में बैठते हैं कोतवाल*
इस कोतवाली की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ के प्रभारी निरीक्षक (SHO) अपनी आधिकारिक कुर्सी पर बैठने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। सालों से चली आ रही इस परंपरा के तहत, थानेदार की मुख्य कुर्सी पर बाबा काल भैरव की तस्वीर या उनका प्रतीक स्वरूप आसन लगा रहता है। जो भी अधिकारी यहाँ तैनात होकर आता है, वह अपनी मेज के बगल में दूसरी कुर्सी लगाकर बैठता है और वहीं से सरकारी कामकाज निपटाता है।

*1715 से अटूट विश्वास: बाजीराव पेशवा ने बनवाया था मंदिर*
मान्यता है कि साल 1715 में बाजीराव पेशवा ने काल भैरव मंदिर का निर्माण कराया था। तभी से बाबा को काशी का सुरक्षा प्रहरी या ‘कोतवाल’ माना जाता है।

**मान्यता: कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ ने पूरी काशी का लेखा-जोखा और सुरक्षा का जिम्मा बाबा काल भैरव को सौंप रखा है।
**अनुमति: जनश्रुति है कि बाबा की अदृश्य अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति काशी में वास नहीं कर सकता। यहाँ तक कि बड़े से बड़े IAS या IPS अधिकारी भी जिले में कार्यभार संभालने से पहले बाबा की चौखट पर मत्था टेकना नहीं भूलते।
**पुलिसकर्मियों का अनुभव: “18 साल से कुर्सी खाली है”.

कोतवाली में तैनात पुराने कॉन्स्टेबलों और अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल में कभी किसी प्रभारी को उस मुख्य कुर्सी पर बैठते नहीं देखा। पुलिसकर्मी दिन की शुरुआत बाबा की पूजा और आरती से करते हैं। लोगों का विश्वास है कि बाबा खुद थाने में मौजूद रहकर आने-जाने वालों पर नजर रखते हैं और न्याय सुनिश्चित करते हैं।

*दर्शन और आरती का विशेष महत्व*
काल भैरव मंदिर में प्रतिदिन चार बार आरती होती है, जिसमें रात्रि आरती सबसे प्रमुख है।
**प्रतिबंध: आरती के समय पुजारी के अतिरिक्त गर्भगृह में किसी का प्रवेश वर्जित होता है।
**श्रृंगार: आरती से पूर्व बाबा का भव्य स्नान और श्रृंगार किया जाता है।
**अखंड ज्योति: मंदिर में एक अखंड दीप और सरसों के तेल का चढ़ावा बाबा की महिमा को और भी खास बनाता है।

*निष्कर्ष: आस्था के सामने नतमस्तक व्यवस्था*
आधुनिक युग में जहाँ पद और प्रतिष्ठा की होड़ लगी है, वहीं वाराणसी का यह थाना यह संदेश देता है कि आस्था और परंपरा आज भी कानून और व्यवस्था से ऊपर का स्थान रखती हैं। यहाँ वर्दी भी ‘महाकाल’ के दूत के आगे नतमस्तक दिखाई देती है।

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