*पिता की विरासत, बेटे का संकल्प: रमेश रत्नाकर ने थामा भाजपा का दामन, राष्ट्रसेवा और कला को बनाया साधना*

रविंद्र कुमार,संपादक/मुजफ्फरपुर/26 मई 2026 :: मुजफ्फरपुर के राष्ट्रवादी हलकों में स्व. धर्मनाथ चौधरी का नाम एक ऐसी नींव के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने जनसंघ से लेकर भाजपा तक के सफर में अपना जीवन संगठन के नाम समर्पित कर दिया था।

अब उसी राष्ट्रवादी विरासत को उनके पुत्र रमेश रत्नाकर आगे बढ़ा रहे हैं। कला, उद्घोषणा और सामाजिक सक्रियता के बाद, अब वे पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को धरातल पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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#न्यूज़हाईलाइट्स:
*वैचारिक विरासत*: स्व. धर्मनाथ चौधरी के पदचिह्नों पर चलते हुए रमेश रत्नाकर ने भाजपा के प्रति अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त की है।
*संघ से जुड़ाव*: बचपन से ही संघ की शाखाओं और भाजपा की रैलियों में सक्रिय रहे रमेश रत्नाकर ने कॉलेज जीवन में NSS, एयर विंग और ABVP के माध्यम से राष्ट्रवाद की शिक्षा को आत्मसात किया।
*कला और सामाजिक सरोकार का संगम*: वर्तमान में ‘कायाकल्प नाट्य संस्था’ के अध्यक्ष, ‘कलाकुंज’ के संस्थापक और ‘महाकाल सेवा दल’ के महामंत्री के रूप में वे समाज सेवा और कला के माध्यम से जन-जुड़ाव बना रहे हैं।
*संगठनात्मक समर्पण*: कला के प्रति अपने झुकाव के कारण बीच के वर्षों में संगठन से सक्रिय दूरी के बाद, अब उन्होंने पुनः भाजपा के कार्यक्रमों में अपना पूर्ण समय समर्पित करने का संकल्प लिया है।
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*एक बहुआयामी व्यक्तित्व का राजनीतिक सफर*
रमेश रत्नाकर का व्यक्तित्व कला और राजनीति का एक अनूठा संगम है। एक प्रसिद्ध रंगकर्मी और उद्घोषक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने के बाद, वे अब राजनीतिक गलियारों में अपनी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित कर रहे हैं।

उनके समर्थक इसे ‘कला का राजनीति के माध्यम से समाज सेवा में रूपांतरण’ मान रहे हैं। महाकाल सेवा दल के महामंत्री के रूप में उनकी भूमिका यह दर्शाती है कि वे धरातल से जुड़े हुए कार्यों को प्राथमिकता देते हैं।
*संपादकीय टिप्पणी*

राजनीति और कला का समन्वय समाज में सकारात्मक संदेश देता है। रमेश रत्नाकर का भाजपा के प्रति समर्पण केवल एक राजनीतिक चुनाव नहीं, बल्कि अपने पिता के मूल्यों के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धांजलि है। एक ओर जहाँ वे अपनी नाट्य संस्थाओं के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना जगा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक मंच का उपयोग समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने के लिए कर रहे हैं।

मुजफ्फरपुर के राजनीतिक पटल पर यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी यह ‘सांस्कृतिक-राजनीतिक’ ऊर्जा संगठन को और कितनी मजबूती प्रदान करती है।
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