*’अमेरिका फर्स्ट’ या वैश्विक व्यवस्था का अंत? विश्व कूटनीति के क्षरण के नये अध्याय की शुरुआत*
*वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार सिन्हा द्वारा विशेष विश्लेषण*

कूटनीति के ताबूत में आखिरी कील? सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि युद्धों की समाप्ति नहीं, बल्कि उन्हें टालने की वह महीन कला है जिसे दुनिया ‘कूटनीति’ के नाम से जानती है। कूटनीति, जो तलवार की धार से नहीं, शब्दों के सेतु से चलती है; जो शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि संयम की मांग करती है। लेकिन वर्तमान वैश्विक परिदृश्य, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के उदय के बाद, इस कला पर गहरा प्रहार हुआ है। ट्रंप के कार्यकाल का शुरुआती दौर कूटनीतिक संतुलन के लिए किसी ‘ब्लैक होल’ से कम साबित नहीं हुआ।

1. रिश्तों का ‘कॉर्पोरेट अधिग्रहण’: सौदागर बनाम राजनयिक
डोनाल्ड ट्रंप मूलतः राजनेता नहीं, एक हार्डकोर व्यवसायी हैं। उनकी विदेश नीति अंतरराष्ट्रीय संबंधों को ‘सुपरमार्केट के अनुबंध’ की तरह देखती है।
**व्यापारिक दृष्टि: उनके लिए हर राष्ट्र या तो ‘ग्राहक’ है या ‘प्रतिद्वंद्वी’।
**ब्लैकमेल कूटनीति: मित्र देशों को “ज्यादा भुगतान करो या सुरक्षा भूलो” जैसी चेतावनी देना संवाद नहीं, बल्कि एक प्रकार का रणनीतिक ब्लैकमेल है।

**स्मृति का अभाव: अंतरराष्ट्रीय संबंध इतिहास, संवेदना और साझा मूल्यों पर टिके होते हैं, जिन्हें ट्रंप ने ‘मुनाफे और घाटे’ की बैलेंस शीट में तब्दील कर दिया है।
2. **संवाद की जगह ‘धमकी’ का बोलबाला**
जब किसी राष्ट्राध्यक्ष की भाषा में ‘धमकी’ मुख्य स्वर बन जाए, तो कूटनीति का दम घुटने लगता है। व्यापार युद्ध, सैन्य कार्रवाई और संधियां तोड़ने की निरंतर धमकियों ने दुनिया को डराया तो जरूर, लेकिन स्थायी शांति का मार्ग अवरुद्ध कर दिया।
“धमकी सुनने वाले को समझने का अवसर नहीं, केवल डरने का विकल्प देती है—और डर कभी भरोसे की बुनियाद नहीं हो सकता।”

3.*वैश्विक संस्थाओं का अवमान और अराजकता की आहट*
संयुक्त राष्ट्र (UN), WHO और नाटो (NATO) जैसी संस्थाएं, जो वैश्विक स्थिरता की धुरी रही हैं, ट्रंप की दृष्टि में ‘अमेरिका पर बोझ’ बनकर उभरीं।
**संस्थागत उपहास: जब दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश वैश्विक नियमों को “बेमतलब” कहता है, तो यह अराजकता को आमंत्रण है।

**जंगल राज का खतरा: यदि हर शक्तिशाली देश यह कहने लगे कि “मैं नियमों से ऊपर हूँ”, तो विश्व राजनीति एक ‘रणक्षेत्र’ में तब्दील हो जाएगी। महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसे अस्तित्वगत संकटों पर ट्रंप की ‘उदासीनता’ मानवीय असंवेदनशीलता का चरम उदाहरण है।
4. **मित्र और शत्रु के बीच धुंधली होती लकीरें**
ट्रंप की कूटनीति की सबसे आत्मघाती विशेषता रही है—अपने ही सहयोगियों का तिरस्कार। दशकों पुराने रणनीतिक गठबंधन (जैसे नाटो) को “लुटेरा तंत्र” कहना न केवल सहयोगियों को अपमानित करता है, बल्कि विरोधियों को अवसर प्रदान करता है।

**भरोसे का संकट: यूरोप और एशिया के मित्र देश अब वाशिंगटन की ओर नेतृत्व के लिए नहीं, बल्कि संदेह के साथ देखते हैं।
**अस्थिरता: जब महाशक्ति का रुख ‘सनक’ और ‘मनोदशा’ पर निर्भर हो जाए, तो वैश्विक व्यवस्था चरमरा जाती है।

**निष्कर्ष: मानवता बनाम वर्चस्व**
ट्रंप की नीति में ‘राष्ट्र’ का अहंकार इतना विशाल हो गया कि उसके नीचे ‘मनुष्य’ दब गया। “मैं अमेरिका के लिए चुना गया हूँ, दुनिया के लिए नहीं” कहना सुनने में तो राष्ट्रवादी लगता है, लेकिन एक महाशक्ति के लिए यह नैतिक दिवालियापन है। क्योंकि जब आपके फैसले दुनिया की सांसों पर असर डालते हों, तो आपकी जिम्मेदारी केवल आपके मतदाताओं तक सीमित नहीं हो सकती।
आज दुनिया फिर एक निर्णायक मोड़ पर है: क्या हम 21वीं सदी में नियमों पर आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ेंगे, या फिर ‘शक्ति ही सत्य है’ के पाषाण युग में लौट जाएंगे? यदि संवाद घायल रहा, तो युद्ध केवल समय का प्रश्न बनकर रह जाएगा।
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प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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