*बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर लेखक अवधेश झा की कलम से*

पटना, 23 जनवरी 2026 :: बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा का उत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। लेकिन क्या यह महज परीक्षा सफलता या कला कौशल तक सीमित है? प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, सरस्वती पूजा वास्तव में वाणी की शुद्धि, बुद्धि की प्रखरता और ब्रह्मबोध की गहन साधना है। लेखक अवधेश झा के अनुसार, यह पूजा अक्षर ज्ञान से आत्मज्ञान तक ले जाती है, जहां वैखरी वाणी परा-वाणी में विलीन हो जाती है।

****ऋग्वेद से उपनिषद तक का गहरा दर्शन****
ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र “चत्वारि वाक् परिमिता पदानि” में वाणी के चार स्तरों का वर्णन है:

*परा: शुद्ध चैतन्य, ब्रह्म में स्थित मौन वाणी।
*पश्यन्ती: सूक्ष्म विचार-बीज।
*मध्यमा: मन में आकार लेती वाणी।
*वैखरी: बोली जाने वाली शब्दावली।

सरस्वती पूजा का असली लक्ष्य वैखरी नहीं, बल्कि परा-वाणी की सिद्धि है, जहां वाणी और मौन एकाकार हो जाते हैं। सरस्वतीरहस्योपनिषद् देवी को वीणा-पुस्तकधारिणी के बजाय वेदांत की ब्रह्मविद्या शक्ति के रूप में चित्रित करता है। इसमें कहा गया है, “या वेदान्तार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमार्थतः”—सरस्वती वेदांत के तत्त्व की एकमात्र स्वरूपा हैं।न्यायमूर्ति राजेंद्र प्रसाद के उद्धरण से स्पष्ट होता है: “जब माता सरस्वती जिह्वा, वाणी और ब्रह्मभाव में प्रतिष्ठित हो जाती हैं, तब प्रवाहित होने वाली विद्या उनकी कृपा है, जो ब्रह्म सत्य और आत्मा की तरह नित्य है।” यह पूजा अविद्या का नाश कर नाम-रूपातीत सत्य का साक्षात्कार कराती है।

****उपनिषदिक साधना का क्रमिक पथ****
उपनिषद् की दस ऋचाएं सरस्वती पूजा को साधना-पथ के रूप में रेखांकित करती हैं:
*आरंभ: बुद्धि, मेधा और धारणा की रक्षा।
*मध्य: अद्वैत ब्रह्मशक्ति का बोध और तत्त्व दर्शन।
*शिखर: निर्विकल्प समाधि, जहां देहाभिमान नष्ट होकर परमात्मा का अनुभव होता है।

“सरस्वती दशश्लोक्या… परां सिद्धिमलभं मुनिपुङ्गवाः” मंत्र इसी की पुष्टि करता है। उपनिषद् माया की आवरण-विक्षेप शक्ति और जीव-ईश्वर-ब्रह्म के मिथ्यात्व को उद्घाटित करता है: “मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो नहि।” अंततः एकमेव सच्चिदानंद ब्रह्म ही सत्य है।आजकल यह पूजा परीक्षा उत्तीर्णता तक सिमट गई है, लेकिन उपनिषद् विद्या का चरम लक्ष्य मुक्ति, वाणी का मौन-बोध और बुद्धि का अहं-शून्यता बताते हैं।

****आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता****
बिहार-झारखंड जैसे क्षेत्रों में सरस्वती पूजा सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाई जाती है, लेकिन इसका आध्यात्मिक आयाम युवाओं को प्रेरित कर सकता है। ब्रह्मरूपिणी सरस्वती बाहर नहीं, हमारी चैतन्य-प्रतिभा हैं—वही कवित्व, वैदिक ज्ञान और मुक्ति प्रदायिनी।
*****ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः*****
मेरी वाणी शुद्ध हो, बुद्धि ब्रह्मगामी बने और जीवन सत्य में प्रतिष्ठित रहे। कोटि-कोटि नमन।
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