*अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने कायस्थ समाज से एकजुट होने का आग्रह किया*

** रविंद्र कुमार,संपादक/पटना, 30 अक्टूबर 2025** :: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने कायस्थ समाज को संगठित होकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का आह्वान किया है। महासभा के प्रमुख डॉ. अनूप श्रीवास्तव ने एक बयान जारी कर कहा कि अब समय आ गया है जागने का, एकजुट होने का और अपनी एकता की ताकत साबित करने का। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अपील की, “जहां कायस्थ उम्मीदवार खड़े हैं, वहां आंख बंद करके उन्हें वोट दो। इस बार वोट नहीं, अपनी पहचान दो!” यह बयान कायस्थ समाज की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक उपेक्षा के खिलाफ एक मजबूत आवाज के रूप में सामने आया है।

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा, “अबकी बार समाज की पुकार है! जिस समाज ने बिहार को दिशा दी, आज वही समाज राजनीति से बेदखल हो रहा है।” उन्होंने चिंता जताई कि प्रमुख राजनीतिक दलों ने कायस्थ समाज को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। टिकट वितरण में जातिगत समीकरणों के नाम पर कायस्थ उम्मीदवारों को दरकिनार किया जा रहा है, जबकि यह समाज बिहार की राजनीति, प्रशासन और स्वतंत्रता संग्राम का मजबूत स्तंभ रहा है। “तुम्हारी जाति कमजोर है, इसलिए टिकट नहीं मिलेगा!”—ऐसे अपमानजनक बयानों से कायस्थ समाज आहत है, लेकिन अब चुप रहना गलत होगा।

*कायस्थ समाज का ऐतिहासिक योगदान: उपेक्षा क्यों?*
कायस्थ समाज ने बिहार और देश को कई महान हस्तियां दी हैं, जिन्होंने इतिहास रचा। डॉ. श्रीवास्तव ने याद दिलाया कि डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा बिहार के निर्माता थे, जिन्होंने संविधान सभा की अध्यक्षता की। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के पहले राष्ट्रपति और संविधान के प्रमुख निर्माता रहे। भारत रत्न जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति के माध्यम से लोकतंत्र को आपातकाल की बेड़ियों से आजाद कराया। इसके अलावा, के.बी. सहाय और महामाया प्रसाद जैसे कायस्थ नेताओं ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की राजनीति को नई दिशा दी।

महासभा के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद कायस्थ समाज ने प्रशासनिक सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे नौकरशाही के backbone रहे, लेकिन आज वोट बैंक की राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है। 2020 के चुनावों में भी कायस्थ उम्मीदवारों की संख्या न्यूनतम थी, और 2025 में यह स्थिति और बिगड़ती नजर आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि आरक्षण और जातिगत गठजोड़ों के कारण छोटे समुदायों को नुकसान हो रहा है। एक राजनीतिक विश्लेषक ने बताया, “कायस्थ समाज शिक्षित और प्रभावशाली है, लेकिन संगठित वोटिंग न होने से दल उन्हें नजरअंदाज करते हैं।”

*जिम्मेदारी किसकी?समाज की चुप्पी या दलों की नीतियां?*
डॉ. श्रीवास्तव ने सवाल उठाया कि हमारा समाज धरातल पर कैसे आ गया? कब तक हम सिर्फ योगदान देंगे, लेकिन सत्ता और प्रतिनिधित्व से वंचित रहेंगे? उन्होंने कहा कि जिम्मेदारी दोनों तरफ है—राजनीतिक दलों की जातिवादी सोच और समाज की बिखराव। महासभा ने फैसला किया है कि आगामी चुनावों में कायस्थ उम्मीदवारों के समर्थन के लिए एक रणनीति बनेगी। इसमें सोशल मीडिया कैंपेन, जागरूकता रैलियां और वोटर लिस्टिंग शामिल है। “अब वक्त है संगठित वोटिंग का। जहां कायस्थ उम्मीदवार हैं, वहां बिना शर्त समर्थन दो,” उन्होंने जोर देकर कहा।

अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के अन्य पदाधिकारियों ने भी समर्थन जताया। महासचिव ने बताया कि बिहार में 5-7% कायस्थ वोटर हैं, जो निर्णायक साबित हो सकते हैं। समाज के युवा कार्यकर्ता पटना, मुजफ्फरपुर और भागलपुर जैसे जिलों में बैठकें कर रहे हैं। एक युवा कायस्थ नेता ने कहा, “हमारी पीढ़ी शिक्षा पर जोर देती है, लेकिन राजनीति में हिस्सेदारी जरूरी है। यह आह्वान सही दिशा में कदम है।”

*आगे की राह: एकता से ताकत*
महासभा ने सभी कायस्थों से अपील की कि वे जातिगत एकता को मजबूत करें। डॉ. श्रीवास्तव ने चेतावनी दी कि यदि अब नहीं जागे, तो आने वाले चुनावों में स्थिति और खराब हो जाएगी। “यह सिर्फ टिकट का मुद्दा नहीं, हमारी पहचान और अस्तित्व का सवाल है। बिहार को दिशा देने वाले समाज को अब खुद की दिशा खुद तय करनी होगी।” राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर सतर्क हो सकते हैं, क्योंकि कायस्थ वोट बिखरने से गठबंधनों पर असर पड़ सकता है।
यह आह्वान बिहार की राजनीति में नया मोड़ ला सकता है, जहां जातिगत समीकरण हमेशा केंद्र में रहते हैं। समाज के संगठन उम्मीद कर रहे हैं कि यह आवाज अनसुनी न रहे।

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