*उर्दू मुशायरों में उर्दू की मौजूदगी घट रही: बैनर से लेकर निमंत्रण तक गैर-उर्दू भाषाओं का बोलबाला, विशेषज्ञों ने चिंता जताई*

**मुंबई, 30 अक्टूबर 2025** :: देशभर में उर्दू मुशायरों की धूम तो है, लेकिन इन आयोजनों में उर्दू भाषा की मौजूदगी महज रस्मी तौर पर सिमटती नजर आ रही है। एम.डब्ल्यू.डी. अंसारी (रिटायर्ड आईपीएस) ने एक लेख में चिंता जताई है कि मुशायरों के बैनर, निमंत्रण पत्र और प्रचार सामग्री में उर्दू गायब हो रही है, जबकि यह अपनी ही महफिल में अजनबी सी हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो उर्दू की रौनक सिर्फ तस्वीरों तक सीमित रह जाएगी।

अंसारी ने लिखा कि आजकल हर नुक्कड़ से लेकर साहित्यिक सभागार तक मुशायरों का सिलसिला चल रहा है—दिल्ली के ऐतिहासिक किले से लखनऊ की उर्दू गलियों, भोपाल के सांस्कृतिक हॉल से सीहोर के प्रोग्राम तक। शायर अपने कलाम से माहौल गुलजार कर रहे हैं, साहित्य प्रेमी तालियां बजा रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह जश्न उर्दू की तन्हाई का प्रतीक बन चुका है।

बैनरों पर स्पॉन्सरों के लोगो और शेड्यूल चमकते हैं, लेकिन उर्दू का नामो-निशान मुश्किल से एक लाइन में नजर आता है—वह भी दिखावे के तौर पर। शायरों के तआरुफ और अशआर रोमन उर्दू या अंग्रेजी में छपे दिखते हैं।

हाल ही में भोपाल के फाटक ग्राउंड, सीहोर में ‘बज़्म-ए-उर्दू अरब’ के तहत मुशायरा होने का ऐलान हुआ, लेकिन इसका बैनर पूरी तरह हिंदी में था। ऊपर लिखा था, “बज़्म उर्दू अरब के जेरे एहतमाम एक शानदार मुशायरा व कवि सम्मेलन।” उर्दू का एक लफ्ज भी नहीं। अंसारी ने अपील की कि आयोजक और शरीक शायर इस गलती को सुधारें। इसी तरह, 31 अक्टूबर को सर सैयर (उर्दू पत्रकारिता दिवस) पर देश-विदेश में कार्यक्रम हुए, लेकिन कई बैनर पूरी तरह अंग्रेजी में थे—उर्दू का नाम तक नहीं।

अंसारी ने कहा, “यह रवैया उर्दू के साथ खिलवाड़ है। हम भावनात्मक रूप से इसे चाहते हैं, लेकिन व्यवहार में जगह नहीं देते। जब अपने कार्यक्रमों में उर्दू को नजरअंदाज करेंगे, तो सरकार से शिकायत का क्या मतलब?” उन्होंने सरकारी नीतियों पर भी निशाना साधा—कई राज्यों में उर्दू सहायता की फाइलें अटकी हैं, पाठ्यक्रम में साइंस-मैथ्स की उर्दू किताबें दुर्लभ हैं, मदरसों और उर्दू अकादमियों को फंडिंग की मार झेलनी पड़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मुशायरों को उर्दू बचाने का प्लेटफॉर्म बनना चाहिए। अंसारी ने सुझाव दिए:
1. सभी बैनर, निमंत्रण और सामग्री उर्दू लिपि में अनिवार्य हो।
2. शायर और श्रोता अपनी गुफ्तगू में उर्दू को प्राथमिकता दें।
3. सरकारी सहायता और पाठ्यक्रम में उर्दू के लिए मांग उठाएं।
4. स्कूल-कॉलेजों में सभी विषयों की गुणवत्ता वाली उर्दू किताबें उपलब्ध कराएं।
5. हर जिले में उर्दू सहायता की तत्काल जरूरतें पूरी हों।
6. सरकारी नोटिस, विज्ञापनों में उर्दू को बराबरी का स्थान मिले।
7. सामाजिक स्तर पर लिखित और ऑनलाइन संवाद में उर्दू लिपि का इस्तेमाल बढ़े।

अंसारी ने चेतावनी दी, “मुशायरों की रौशनी घंटों बाद बुझ जाती है, लेकिन लिपि, पाठ्यक्रम और सरकारी नीतियों में भाषा की मौजूदगी हमेशा बाकी रहती है। यदि हम उर्दू को ‘महफिल की रौनक’ तक सीमित रखेंगे, तो आने वाले वक्त में यह सिर्फ तस्वीरों में मुस्कुराएगी, सांस नहीं लेगी। फैसला हमारे हाथ में है—उर्दू को जश्न का ज़ेवर बनाएं या रस्म अदायगी का हिस्सा।”
उर्दू प्रेमी संगठनों ने इस लेख का स्वागत किया है और कहा कि यह उर्दू को जीवंत रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

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