*सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी*

नई दिल्ली/10 जुलाई 2025 :: राजद के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा सहित कई अन्य लोगो ने सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर रोक लगाने हेतू अर्जी दी थी.
इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के वकीलों की बातों को सुनने के बाद
सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एसआईआर पर रोक लगाने से इनकार करते हुए चुनाव आयोग को बड़ी राहत दी.

लेकिन इसके साथ ही कई तरह के गंभीर सवाल भी उठाए हैं. अदालत ने स्पष्ट कहा कि यह मामला लोकतंत्र की जड़ों और नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ा है, इसलिए चुनाव आयोग को पूरी पारदर्शिता और समयबद्धता के साथ कार्य करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधे सवाल किया कि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया इतनी देर से क्यों शुरू हुई, जबकि यह काम चुनाव से महीनों पहले हो जाना चाहिए था। अदालत ने यह भी कहा कि प्रक्रिया में कोई आपत्ति नहीं, लेकिन इसकी टाइमिंग पर सवाल उठाना जायज है.
चुनाव आयोग की तरफ से कहा गया कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण 2003 से होता आ रहा है और यह लोकतंत्र के लिए जरूरी प्रक्रिया है। आयोग ने यह भी बताया कि इस बार 57% मतदाताओं ने पहले ही फॉर्म भर दिए हैं और बाकियों से दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं ताकि सूची को शुद्ध किया जा सके। आयोग ने 11 वैकल्पिक दस्तावेजों की सूची दी है जिनके आधार पर नागरिकों की पहचान हो सकती है। इनमें आधार, राशन कार्ड, वोटर आईडी जैसे दस्तावेज शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने आधार कार्ड को लेकर चुनाव आयोग के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि एक ओर पूरा देश पहचान के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल कर रहा है, वहीं चुनाव आयोग इसे खारिज कर रहा है और माता-पिता के दस्तावेज मांग रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी आयोग से स्पष्ट जवाब मांगा और दस्तावेजों की सूची में आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी को शामिल करने का सुझाव दिया।
चुनाव आयोग के वकील ने अपनी सफाई में कहा कि किसी नागरिक को बाहर करने का इरादा नहीं, चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और मतदाता इसके केंद्र में हैं। उन्होंने कहा कि आयोग का उद्देश्य किसी को बाहर करना नहीं है और न ही जाति, धर्म या किसी अन्य आधार पर भेदभाव करना संभव है। जब तक कानून आदेश न दे, तब तक किसी को मतदाता सूची से हटाया नहीं जा सकता।

इस अहम मामले में अब अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी। तब तक चुनाव आयोग को अदालत के सवालों और सुझावों पर अपना पक्ष साफ करना होगा।
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