*भीड़, भगदड़ और प्रशासनिक नाकामी — क्या इसमें हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं?*
— *रविन्द्र कुमार, संपादक,बिहार न्यूज़ 18*
देश में त्योहारों और उत्सवों का दौर चल रहा है। मंदिरों में लंबी कतारें हैं, मेलों में जनसैलाब उमड़ रहा है और धार्मिक आयोजनों में आस्था का उफान है। लेकिन इस उल्लास के बीच एक खौफनाक हकीकत हर साल दोहराई जाती है—अव्यवस्था, भगदड़ और अकाल मृत्यु।
हाल ही में 17 अक्टूबर को कोलकाता के चोरबाजार स्थित सार्वजनिक पूजा पंडाल में मची भगदड़ ने एक बार फिर देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे में 19 निर्दोष लोगों की जान चली गई और 25 से अधिक लोग बुरी तरह घायल हो गए। 
लेकिन इसके बाद क्या हुआ? वही पुरानी परिपाटी—जांच कमेटियों का गठन, बयानों का दौर और पीड़ित परिवारों के लिए 1 से 5 लाख रुपये तक की सहायता राशि या मुआवजे का ऐलान!
👍*मुआवजा: क्या यह किसी माँ की गोद का सन्नाटा भर सकता है?*
यहाँ एक बड़ा और कड़वा सवाल यह खड़ा होता है—क्या कुछ लाख रुपये का मुआवजा उस माँ की सुनी गोद को भर सकता है जिसने अपना बच्चा खोया है? क्या किसी परिवार के रोते-बिलखते चिरागों की कीमत पैसों में तय की जा सकती है?

मुआवजा और जांच आयोग सरकारों के लिए जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का एक आसान साधन बन चुके हैं। प्रणाली इतनी संवेदनहीन हो चुकी है कि वह मौतों का हिसाब नोटों की गड्डियों से करने लगी है। वास्तविकता यह है कि मुआवजा जीवन का विकल्प नहीं है; असली जवाबदेही हादसों को होने से पहले रोकने में है।

👍*प्रशासनिक नाकामी और आधुनिक तकनीक का अभाव*
हादसों की सबसे बड़ी वजह भीड़-प्रबंधन में नई तकनीक और दूरदर्शिता का अभाव है।
👌आयोजनों में क्षमता से अधिक भीड़ को एकत्र होने दिया जाता है।
👍आयोजक चमक-धमक और प्रचार पर लाखों खर्च करते हैं, लेकिन आपातकालीन निकास , सीसीटीवी निगरानी और प्राथमिक चिकित्सा पर ध्यान नहीं देते।
👍प्रशासन को जब भीड़ बढ़ते दिखे, उसी समय प्रवेश रोकना चाहिए या आयोजन को अस्थायी रूप से बंद करने का साहस दिखाना चाहिए, लेकिन जवाबदेही का हमेशा अभाव दिखता है।

👍*आईना खुद को भी दिखाना होगा: हम कितने जिम्मेदार हैं?*
केवल प्रशासन और पुलिस को कोसकर हम अपनी नागरिक जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते। समाज में यह बड़ी विडंबना है कि हम हादसे के बाद तंत्र को तो दोष देते हैं, लेकिन हादसे से पहले खुद अपने नागरिक व्यवहार को बदलने को तैयार नहीं होते।
👌नियमों की अनदेखी: हम प्रवेश और निकास के नियमों को तोड़कर जबरन आगे बढ़ने की होड़ में लग जाते हैं।
👌धक्का-मुक्की और अफवाहे: बिना सच्चाई जाने अफवाहों पर भरोसा करके भागने लगना या दूसरों को धक्का देकर आगे निकलने की कोशिश ही अक्सर भगदड़ का रूप ले लेती है।
👌अहंकार और जिद: “पहले मैं पहुँचूँगा” की जिद और भीड़ में भी आगे निकलने की प्रवृत्ति सामूहिक खतरे को बढ़ा देती है।

🌹*संपादकीय निष्कर्ष: सतर्कता ही सच्चा उल्लास है*🌹
पुलिस और प्रशासन आपकी सुरक्षा के लिए तैनात हो सकते हैं, लेकिन हर पल वे आपके साथ खड़े नहीं हो सकते। अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना और दूसरों की जान को खतरे में न डालना हर नागरिक का प्राथमिक कर्तव्य है। 
आस्था का अर्थ अव्यवस्था को स्वीकार करना नहीं है और मनोरंजन का अर्थ जान जोखिम में डालना नहीं है। किसी भी त्योहार या उत्सव का असली अर्थ तभी सार्थक होता है, जब खुशी-खुशी घर निकला व्यक्ति सुरक्षित अपने परिवार के पास वापस पहुँचे। अभी दशहरा खत्म हुआ है अभी दीपावली आनी है छठ पूजा आने हैं और इन सभी आयोजनो में भीड़ भाड़ का होना लाजमी है, अगर हम अब भी न जागे, आने वाले दिनों में किसी बड़े हादसे का इंतजार करेंगे. अगले कुछ दिनों में, कुछ महीनो में कोलकाता हादसे को भी भूल जाएंगे और हमारे साथ प्रशासन भी भविष्य में होनेवाले किसी बड़े हादसे का इंतजार करेगा। 
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प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
मो .9304238302
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