October 20, 2026

*मायानगरी छोड़ जड़ों की ओर लौटे अभिनेता हैदर काज़मी: जहानाबाद में 12 एकड़ जमीन पर “हैदर काज़मी फिल्म सिटी” बना कर बिहार के युवाओं को दिया नया सिनेमाई मंच”*

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​ #न्यूज़हाईलाइट्स:

👍​सब्सिडी की कागजी चमक से परे: हैदर काज़मी का ‘काको पाली मॉडल’ बिहार में सिनेमाई क्रांति का बन रहा नया आधार.

👍​’मगध सम्मान’ से अलंकृत: जहानाबाद के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जिला प्रशासन द्वारा अभिनेता-निर्देशक हैदर काज़मी को उनके दो दशकों के संघर्ष के लिए ‘मगध सम्मान’ से नवाजा गया।

👍​फिल्म सिटी का निर्माण: जहानाबाद के काको प्रखंड स्थित अलीनगर पाली में 12 एकड़ भूमि पर अत्याधुनिक ‘हैदर काज़मी फिल्म सिटी’ की स्थापना।

👍​बिहार स्कूल ऑफ ड्रामा की सौगात: फिल्म परिसर में स्थापित इस संस्थान में एक बार में 40 स्थानीय युवाओं को अभिनय, निर्देशन और तकनीकी प्रशिक्षण के साथ सीधे फिल्मों और मंचों पर काम करने का अवसर मिल रहा है।

👍​बॉलीवुड हस्तियों की उपस्थिति: अखिलेंद्र मिश्रा और ओमकार दास मानिकपुरी जैसे दिग्गज कलाकारों का यहाँ आकर शूटिंग करना इस बात का प्रमाण है कि बिहार अब सुरक्षित और बेहतर फिल्म निर्माण केंद्र बन रहा है।

👍​यथार्थवादी सिनेमा की पहल: ‘बैंडिट शकुंतला’, ‘चूहिया’, ‘कजरी’ और ‘ई किल्ड बापू’ जैसी गंभीर व सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों के जरिए सार्थक सिनेमा को बढ़ावा।

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रविन्द्र कुमार, संपादक /​पटना/20 अक्टूबर 2026 :: भारतीय कला और सिनेमा के इतिहास मेंí सफलता के कई मानदंड गढ़े गए हैं, जहाँ लोग मायानगरी मुंबई की चकाचौंध में९0 चमककर अपनी मंजिल तलाशते हैं। लेकिन विरले ही ऐसे कलाकार होते हैं जो सफलता की बुलंदियों को छूने के बाद अपनी जड़ों की ओर लौटते हैं और समाज व माटी के कर्ज को चुकाते हैं। अभिनेता, निर्माता और निर्देशक हैदर काज़मी ने इसी सोच के साथ बिहार के सिनेमाई परिदृश्य को बदलने का बीड़ा उठाया है। हाल ही में जहानाबाद के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जिला प्रशासन द्वारा उन्हें ‘मगध सम्मान’ से सम्मानित किया जाना उनके इसी दो दशकों के अनथक संघर्ष की आधिकारिक मुहर है।

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👍*​प्रतिभा पलायन पर कड़ा प्रहार*

​बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में मेधा और लोक संस्कृति की कभी कोई कमी नहीं रही है। इसके बावजूद, संसाधनों के अभाव और सिनेमाई बुनियादी ढांचे के न होने के कारण यहाँ की प्रतिभाओं को हमेशा महानगरों की ओर पलायन करना पड़ता था। मुंबई और दिल्ली की दौड़, ऑडिशन के संघर्ष कई प्रतिभावान युवाओं के सपनों को बीच में ही तोड़ देते थे। इस विवशता को करीब से देखने वाले हैदर काज़मी ने लीक से हटकर एक साहसिक कदम उठाया और जहानाबाद के काको प्रखंड के अलीनगर पाली में 12 एकड़ भूमि पर ‘हैदर काज़मी फिल्म सिटी’ खड़ी कर दी।

👍*​इकोसिस्टम का निर्माण और ‘बिहार स्कूल ऑफ ड्रामा’*

​किसी भी राज्य में सिनेमा के विकास के लिए केवल अभिनेताओं का होना काफी नहीं होता, बल्कि एक संपूर्ण ‘इकोसिस्टम’ की आवश्यकता होती है। हैदर काज़मी ने पटना, राजगीर और बोधगया के सांस्कृतिक गलियारे के केंद्र में इस फिल्म सिटी का निर्माण कर राष्ट्रीय स्तर के फिल्म निर्माताओं को आकर्षित किया है।

​इस पहल का सबसे क्रांतिकारी पहलू इसके भीतर स्थापित ‘बिहार स्कूल ऑफ ड्रामा’ है। यहाँ एक बार में 40 स्थानीय युवाओं को अभिनय, निर्देशन और तकनीकी का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के तुरंत बाद उन्हें अपने प्रोडक्शन हाउस के माध्यम से लाइव परफॉर्मेंस और फिल्मों में काम करने का अवसर मिलेगा,जो देश के कई बड़े संस्थानों में भी आसानी से उपलब्ध नहीं होता।

👍*​सब्सिडी की राजनीति बनाम ज़मीनी ‘इकोसिस्टम’*

​विशेषज्ञों और विश्लेषकों का मानना है कि सरकारों द्वारा फिल्मों को आकर्षित करने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी (अनुदान) सिर्फ तात्कालिक और अल्पकालिक लाभ देती है, जिससे शूटिंग खत्म होते ही स्थिति फिर शून्य पर आ जाती है। इसके विपरीत, हैदर काज़मी का ‘काको पाली मॉडल’ एक स्थायी बुनियादी ढांचा है।

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​फिल्म जगत में यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है कि “सितारे पैदा करना आसान है, आकाश बनाना मुश्किल है।” बिहार की उपजाऊ माटी ने हमेशा ‘सितारे’ दिए हैं, लेकिन हैदर काज़मी ने जहानाबाद में वह ‘आकाश’ तैयार किया है जिसके नीचे युवा बिना भटके अपनी कला को निखार सकते हैं।

👍*​यथार्थवादी और सार्थक सिनेमा की बयार*

​व्यावसायिक चकाचौंध से दूर, हैदर काज़मी ने समाज की सच्ची तस्वीरों को अपनी कला का माध्यम बनाया है। मधुबनी की शकुंतला महतो के जीवन पर आधारित फिल्म ‘बैंडिट शकुंतला’ (जिसमें असली बैंडिट को मुख्य भूमिका दी गई), शिक्षा और जातिगत विसंगतियों पर प्रहार करती फिल्म ‘चूहिया’, तथा ‘कजरी’ और ‘ई किल्ड बापू’ जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि उनका सिनेमा सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का एक सशक्त जरिया है।

🌹*​संपादकीय टिप्पणी*🌹

​*कागजी घोषणाओं से आगे की राह—हैदर काज़मी का मॉडल*

​किसी भी राज्य की सांस्कृतिक और आर्थिक प्रगति केवल मौद्रिक प्रोत्साहन, विज्ञापनी घोषणापत्रों या कागजी सब्सिडी से तय नहीं हो सकती। जब तक धरातल पर स्थायी बुनियादी ढांचा (Infrastructure) और एक मजबूत इकोसिस्टम विकसित नहीं किया जाता, तब तक स्थानीय प्रतिभाओं का पलायन नहीं रोका जा सकता।

​हैदर काज़मी का यह सफर यह सिखाता है कि अपनी माटी की तकदीर बदलने के लिए सरकारी तंत्र के भरोसे बैठने की जरूरत नहीं होती, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प से एक अकेला व्यक्ति भी क्रांति का सूत्रधार बन सकता है। यदि बिहार और अन्य राज्यों को फिल्म निर्माण का प्रमुख केंद्र बनाना है, तो प्रशासनिक मशीनरी को कागजी दावों से बाहर निकलकर काको पाली जैसे जमीनी मॉडलों को पहचानना होगा और उन्हें वित्तीय व प्रशासनिक सहयोग देना होगा। कला जब जड़ों से जुड़ती है, तभी वह समाज की वास्तविक तस्वीर बदलने में सफल होती है।

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रविन्द्र कुमार
रविन्द्र कुमार
प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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