*कला, समर्पण और उपेक्षा का मार्मिक दस्तावेज: ‘अदाकार ख्वाहिश’ ने मंचित किया प्रशांत चटर्जी का चर्चित नाटक ‘बैंड मास्टर’*
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#न्यूज़हाईलाइट्स:
👍स्थान व आयोजन: प्रेमचंद रंगशाला (सैदपुर, पटना) में सांस्कृतिक संस्था ‘अदाकार ख्वाहिश – सांस्कृतिक दर्पण’ द्वारा नाटक ‘बैंड मास्टर’ का मंचन किया गया।
👍विशेष समर्पण: यह सांस्कृतिक प्रस्तुति देश के जाने-माने सारंगी वादक स्वर्गीय पंडित किशोरी प्रसाद मिश्रा जी की स्मृति को समर्पित रही। 
👍प्रमुख उपस्थिति: पद्मश्री डॉ. आर. एन. सिंह कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
👍मुख्य भूमिका व निर्देशन: प्रशांत चटर्जी द्वारा लिखित इस नाटक का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी रवि मिश्रा ने किया और ‘नरसू मियाँ’ की मुख्य भूमिका को मंच पर जीवंत किया।
👍मूल विषय: आधुनिकता के दौर में हाशिए पर धकेले जा रहे पारंपरिक बैंड कलाकारों, उनकी वृद्धावस्था की उपेक्षा और कलात्मक स्वाभिमान की पड़ताल।
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रविंद्र कुमार,संपादक/पटना, 08 अक्टूबर 2026 :: बिहार की राजधानी पटना स्थित प्रेमचंद रंगशाला (सैदपुर) में बीती शाम सांस्कृतिक संस्था “अदाकार ख्वाहिश – सांस्कृतिक दर्पण, पटना” द्वारा प्रशांत चटर्जी लिखित बहुचर्चित नाटक ‘बैंड मास्टर’ का भावपूर्ण और प्रभावी मंचन संपन्न हुआ। वर्ष 1996 से रंगकर्म में सक्रिय संस्था का यह आयोजन महान सारंगी वादक स्वर्गीय पंडित किशोरी प्रसाद मिश्रा जी की स्मृति को समर्पित था। कार्यक्रम के दौरान विशिष्ट अतिथि पद्मश्री डॉ. आर. एन. सिंह सहित शहर के कई गणमान्य नागरिक और कलाप्रेमी उपस्थित रहे।

👍*कथानक: उपेक्षा और कला के स्वाभिमान का द्वंद्व*
नाटक का कथानक ‘नरसू मियाँ’ नाम के एक ढलती उम्र के संगीत मर्मज्ञ के इर्द-गिर्द घूमता है, जो कभी बैंड संगीत की दुनिया में क्लैरिनेट वादन के बेजोड़ उस्ताद माने जाते थे। समय के बदलाव और बढ़ती उम्र के साथ उनके अपने ही साथी और महत्वाकांक्षी शागिर्द उन्हें उपेक्षा और शक की नज़र से देखने लगते हैं। 
कहानी में नाटकीय मोड़ तब आता है जब चापलूसी के बल पर मास्टर बना ‘हज़रत’ (आज़ाद शक्ति) एक ग्राहक के सामने अपनी बेसुरी तान के कारण अपमानित होता है। ऐसे संकट के समय वृद्ध और उपेक्षित नरसू मियाँ क्लैरिनेट हाथ में लेते हैं और अपनी साधना की पराकाष्ठा से यह साबित कर देते हैं कि सच्चा सुर और समर्पण कभी बूढ़ा नहीं होता।

👍*मंच और अभिनय का प्रदर्शन*
निर्देशक और मुख्य अभिनेता रवि मिश्रा ने ‘नरसू मियाँ’ के चरित्र में अपनी संजीदा अभिनय शैली से जान फूँक दी। क्लैरिनेट को सीने से लगाकर सुरों की वेदना व्यक्त करते हुए उनके चेहरे के भावों और शारीरिक भाषा ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
सह-पात्रों में आज़ाद शक्ति (हज़रत), सुधीर कमल (अली), हुकुमदेव यादव (हुसैन), दीपक श्रीवास्तव (मालिक) और प्रवीण सप्पू (ग्राहक) ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया।

👍*तकनीकी संयोजन व संगीत पक्ष*
लक्ष्मी मिश्रा और हर्ष आज़ाद का संगीत संयोजन नाटक का मुख्य आकर्षण रहा। क्लैरिनेट की धुनों ने कथा की संवेदना को गहराई प्रदान की। विनय चौहान का प्रकाश-संयोजन (लाइटिंग) और सुमन कुमार की रूप-सज्जा (मेकअप) ने मंच पर पात्रों की मनोदशा और संघर्ष को प्रामाणिक रूप से उभारा।

कार्यक्रम के अंत में संयोजक ऋषि कुमार (कला आंगन, पटना) ने कहा कि ऐसे नाटक न केवल लुप्त हो रही लोक-कलाओं और पारंपरिक संगीत विधाओं को संबल प्रदान करते हैं, बल्कि समाज को अपने बुजुर्ग कलाकारों के प्रति संवेदनशील होने का संदेश भी देते हैं।

🌹*संपादकीय टिप्पणी*🌹
आधुनिक डिजिटल संगीत और व्यावसायिक बैंड बाजे के दौर में पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने वाले कलाकार किस प्रकार गुमनामी के अंधेरे में खो रहे हैं, नाटक ‘बैंड मास्टर’ इस कड़वे सच से पर्दा उठाता है। यह प्रस्तुति केवल एक मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय समाज के उस रवैये पर सीधा प्रहार है जो किसी कलाकार की जवानी की कला का उपभोग तो करता है, लेकिन उसकी वृद्धावस्था में उसे अप्रासंगिक मानकर दरकिनार कर देता है।
रवि मिश्रा का निर्देशन और अभिनय इस बात का प्रमाण है कि क्षेत्रीय रंगमंच आज भी गंभीर सामाजिक विमर्श को जीवंत रखने का सशक्त माध्यम है। पंडित किशोरी प्रसाद मिश्रा जी जैसे महान सारंगी साधक को समर्पित यह मंचन कला के संरक्षण और कलाकारों के सम्मान की दिशा में एक विचारणीय प्रयास है।

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प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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