*जमुई से बांका तक शर्मसार होता बिहार — क्या बेखौफ बदमाशों के आगे पस्त है कानून व्यवस्था?*
*रविन्द्र कुमार,संपादक,बिहार न्यूज़ 18 द्वारा विशेष विश्लेषण*

जमुई में एक नाबालिग बच्ची के साथ दरिंदगी का प्रयास, समस्तीपुर में सरेराह एक लड़की की घेराबंदी कर बदसलूकी और अब बांका के ऐतिहासिक मंदार पर्वत पर युवती के साथ अभद्रता का वायरल होता वीडियो—ये केवल अलग-अलग जिलों से आई तीन छिटपुट खबरें नहीं हैं। यह बिहार की सड़कों पर तेजी से पैर पसारती उस सामाजिक और प्रशासनिक भयावहता का प्रमाण है, जहां महिलाओं की सुरक्षा केवल कागजी दावों तक सिमट कर रह गई है। एक के बाद एक सामने आ रही ये घटनाएं अब पूरे राज्य से एक ही तीखा सवाल पूछ रही हैं: क्या बिहार में बदमाशों के भीतर से पुलिस और कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है?
👍*कानून का घटता इकबाल और ‘वीडियो पुलिसिंग’ की संस्कृति?*
बांका के मंदार पर्वत जैसे प्रमुख पर्यटन स्थल पर जो कुछ हुआ, वह किसी बंद कमरे का अपराध नहीं था। दिन के उजाले में सार्वजनिक स्थान पर बदमाशों का एक गुट लड़की को घेरता है, मनमानी करता है और बेखौफ होकर उसका वीडियो बनाता है। यह दुस्साहस केवल आपराधिक मानसिकता नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सुस्ती का नतीजा है जो सिर्फ वीडियो वायरल होने के बाद हरकत में आती है।

बांका के वीडियो में एक युवक युवती का हाथ मरोड़ता और उसके साथ छेड़छाड़ करता नजर आ रहा है. वीडियो में आरोपी के हाथ में चप्पल दिख रही है और वह मारपीट की कोशिश कर रहा है. सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि इसे ‘हम करेंगे गुंडागर्दी, क्या कर लेगी सरकारी वर्दी’ गाने की लाइन पर रील बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किया गया है.

जब तक खाकी का डर सड़कों पर नजर नहीं आएगा, तब तक ऐसी घटनाएं नहीं रुकेंगी। पर्यटन स्थलों, सुनसान रास्तों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास निवारक गश्त (Preventive Patrol) की भारी कमी है। पुलिस की इस ‘प्रतिक्रियात्मक कार्यप्रणाली’ (Reactive Patrol) ने मनचलों के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि उन्हें न तो जेल जाने का डर है और न ही अदालत की सजा का।

👍*समाज का नैतिक पतन और कैमरों के पीछे छिपे मूकदर्शक*
इन घटनाओं का सबसे विकृत और व्यथित करने वाला पहलू वह मानसिकता है, जो अपराध होते देखकर भी खामोश रहती है। मंदार पर्वत और समस्तीपुर की घटनाओं के समय आसपास लोग मौजूद थे, लेकिन किसी का हाथ पीड़िता की सुरक्षा के लिए आगे नहीं बढ़ा; लेकिन कुछ लोग तो सिर्फ मोबाइल से वीडियो बनाते देखे गये.
🙏*दूसरों की बहन-बेटियों के साथ होती बदसलूकी का तमाशा देखना और उसे डिजिटल स्पेस में वायरल करके विकृत आनंद लेना किस नैतिकता की मिसाल है ?
🙏*यह सवाल उठाना अनिवार्य हो गया है कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है ?
🙏*”घर में माँ, बहन और बेटी होने” की जो दुहाई हम परंपरा और संस्कृति के नाम पर देते आए हैं, क्या वह अब पूरी तरह खोखली हो चुकी है?
अगर समाज अपनी संवेदनाएं खो चुका है और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना भूल गया है, तो यह हमारी सामाजिक व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने का संकेत है।

👍*सरकार की जवाबदेही और ‘जीरो टॉलरेंस’ का धरातल*
बिहार सरकार लगातार राज्य में ‘सुशासन’ और अपराधियों पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करती है, लेकिन ये घटनाये धरातल की हकीकत इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
यदि पुलिस प्रशासन समय रहते इन मनचलों और अपराधियों पर नकेल कसने में नाकाम रहता है, तो इसका सीधा अर्थ है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गहरा रिसाव है।
हालांकि प्रशासन में जमुई वाले केस में कई अपराधियों को गिरफ्तार कर चुकी हैं और मुख्य आरोपी को हाफ काउंटर कर के जेल भेजा जा चुका है.

केवल औपचारिकता के लिए प्राथमिकी दर्ज कर लेना या एक-दो संदिग्धों को हिरासत में ले लेना काफी नहीं है। इन सभी अपराधियों पर सख्त कार्रवाई की जरूरत है. जब तक ऐसे मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक कोर्ट (Fast-Track Courts) के जरिए कर अपराधियों को रिकॉर्ड समय में कठोरतम सजा नहीं दिलाई जाएगी, तब तक समाज में कोई कड़ा संदेश नहीं जाएगा।
बिहार को इस ढर्रे से बाहर निकालने के लिए अब सिर्फ बयानों की नहीं, बल्कि धरातल पर कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है। सरकार और पुलिस प्रशासन को यह साबित करना होगा कि राज्य में कानून का राज अभी भी कायम है।
इसके साथ ही, एक समाज के रूप में हमें भी अपनी गहरी नींद से जागना होगा,—क्योंकि अगर आज हम किसी और की बेटी की चीख पर चुप रहे, तो कल यह घटना हमारे दरवाजे पर भी हो सकता है,तो अगले दिन यह बर्बरता किसी और घर के दरवाजे तक पहुंच सकती है।
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प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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