*स्मार्टफोन क्रांति या डिजिटल अराजकता? रीलबाज़ों की भीड़ में दम तोड़ती पत्रकारिता और सोए हुए पत्रकार संगठन*
— *रविन्द्र कुमार (संपादक, बिहार न्यूज़ 18)*
डिजिटल युग की सुगमता ने आज देश के हर नागरिक के हाथ में कैमरा, माइक और स्मार्टफोन थमा दिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की जननी है, लेकिन आज इस स्वतंत्रता की आड़ में पत्रकारिता के बुनियादी संस्कारों, नैतिकता, तथ्यों की पुष्टि और संपादकीय जवाबदेही को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया गया है।
हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय की यह तल्ख व गंभीर टिप्पणी—“अगर हर नागरिक या मोबाइल लेकर चलने वाला व्यक्ति खुद को पत्रकार घोषित करने लगेगा, तो इससे समाज में गंभीर अराजकता खड़ी होगी”—पूरी मुख्यधारा की मीडिया और पत्रकार संगठनों के लिए एक खतरे की घंटी है। जब अदालत को यह कहना पड़े, तो समझ लेना चाहिए कि पत्रकारिता का यह संकट अब बहस से निकलकर लोकतंत्र के अस्तित्व की दहलीज़ तक पहुँच चुका है।
👍*स्मार्टफोन की सनसनी बनाम ज़िम्मेदारी की पत्रकारिता*

आज मान्यता प्राप्त, ज़मीनी पत्रकारों और सोशल मीडिया पर रील/वीडियो बनाने वाले इन्फ्लुएंसर्स के बीच का अंतर लगभग समाप्त हो गया है। संविधान ने देश के हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, लेकिन ‘पत्रकारिता करने का अनियंत्रित लाइसेंस’ नहीं दिया।
किसी भी संवेदनशील घटना, दुर्घटना या आपदा के स्थल पर आज जान जोखिम में डालकर निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने वाले पेशेवर पत्रकारों से कहीं अधिक संख्या तथाकथित ‘रीलबाज़ों’ की होती है।
*एक तरफ वह रिपोर्टर है जो बाढ़, गोलीबारी या जन-आंदोलन के बीच तथ्यों की पुष्टि (Fact-Check) करते हुए संपादकीय विवेक के साथ रिपोर्ट करता है।
*दूसरी तरफ वह भीड़ है जो दुर्घटना स्थल पर लाशों के बीच रील बनाती है, अस्पताल के ICU के बाहर चीख-चीख कर संवेदनाओं को कंटेंट में बदलती है और थाने में पुलिस से बदसलूकी कर उसे “निडर पत्रकारिता” का नाम देती है।

पहले का उद्देश्य समाज को जागरूक और सूचित करना है, जबकि दूसरे का एकमात्र उद्देश्य सनसनी फैलाकर लाइक्स, व्यूज और व्यूअरशिप बटोरना है। दुखद स्थिति यह है कि आम दर्शक इस बारीक अंतर को समझ नहीं पा रहा और सनसनी फैलाने वालों को ही ‘बड़ा पत्रकार’ मानने लगा है। इसका खामियाजा उन ईमानदार ग्राउंड रिपोर्टरों को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी साख और सुरक्षा दोनों आज खतरे में हैं।
👍*बिहार में विकराल रूप लेती डिजिटल गुंडागर्दी*
बिहार जैसे राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक राज्य में यह प्रवृत्ति चिंताजनक स्तर पर पहुँच चुकी है। राज्य के हर जिले और प्रखंड (ब्लॉक) में दर्जनों लोग ‘न्यूज़’ के नाम पर फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल चलाकर सामाजिक विद्वेष फैलाने का धंधा कर रहे हैं।
किसी की व्यक्तिगत लड़ाई को जातीय रंग देना, बिना किसी सत्यापन के किसी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर वीडियो वायरल कर देना—यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि ‘डिजिटल गुंडागर्दी’ है। इससे न केवल मुख्यधारा के मीडिया की साख गिर रही है, बल्कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन भी भ्रमित हो रहा है कि किसे वास्तविक मीडिया माना जाए और किसे महज कंटेंट क्रिएटर।
👍*पत्रकार संगठनों की शर्मनाक चुप्पी और सोई हुई ज़मीर*
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दुखद और शर्मनाक भूमिका देश व प्रदेश के तमाम पत्रकार संगठनों, प्रेस क्लबों और यूनियनों की रही है। आपसी गुटबाज़ी, चुनावी राजनीति और स्वार्थों में उलझे ये संगठन इस गंभीर संकट पर मूकदर्शक बने हुए हैं।

👍*एक बड़ा सवाल?*
यदि वकीलों के लिए बार काउंसिल है और डॉक्टरों के लिए मेडिकल काउंसिल जैसी संवैधानिक संस्थाएं हैं, तो पत्रकारों के लिए एक सशक्त और जवाबदेह नियामक (Regulatory Body) व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती?
क्या किसी एक संगठन ने सरकार या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) के समक्ष ठोस नीति और आचार संहिता की मांग को लेकर आवाज़ उठाई?
तो जबाब हैं….नहीं, क्योंकि इसमें TRP और व्यक्तिगत स्वार्थ का दायरा आड़े आ जाता है। यदि इन संगठनों ने समय रहते कंटेंट क्रिएटर और वास्तविक पत्रकार के बीच की धुंधली रेखा को साफ नहीं किया, तो इस पवित्र पेशे की बची-कुची गरिमा भी अराजकता की भेंट चढ़ जाएगी।

👍*भावी दिशा: अब क्या करना होगा?*
अदालत ने स्थिति का आईना दिखा दिया है। अब गेंद मुख्यधारा की मीडिया, सरकार और पत्रकार संगठनों के पाले में है। इस संकट से निपटने के लिए निम्नलिखित कदम तत्काल उठाने होंगे:
🙏*स्पष्ट कानूनी व नैतिक विभाजन: सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को मिलकर ‘जवाबदेह पत्रकार’ और ‘डिजिटल कंटेंट क्रिएटर’ के बीच स्पष्ट कानूनी रेखा खींचनी होगी। अनधिकृत प्रेस कार्ड के दुरुपयोग पर सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
🙏*संगठनों की एकजुटता और आचार संहिता: देश और बिहार के सभी पत्रकार संगठनों को अपनी गुटबाजी छोड़कर एक साझा मंच पर आना होगा और डिजिटल युग के अनुकूल सख्त आचार संहिता (Code of Ethics) लागू करनी होगी।
🙏*दर्शक और जनता को जागरूकता: पाठकों और दर्शकों को भी शिक्षित करना होगा कि शोर मचाना और सनसनी परोसना पत्रकारिता नहीं है। सच्ची पत्रकारिता सत्ता से निष्पक्ष सवाल पूछती है और समाज के प्रति जवाबदेह बनाती है.

निष्कर्षतः हम यह लड़ाई किसी के रोज़गार या अभिव्यक्ति के खिलाफ नहीं है, बल्कि पत्रकारिता की आत्मा और उसकी गरिमा को बचाने की लड़ाई है।
यदि आज भी मुख्यधारा के पत्रकार और संगठन खामोश रहे, तो इतिहास हमें दो अपराधों के लिए कभी माफ नहीं करेगा—पहला, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को तिल-तिल कर मरते देखने के लिए; और दूसरा, उस हत्यारी भीड़ में खुद भी एक मूक तमाशबीन बनकर खड़े रहने के लिए। यह समय आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर माइक और कैमरे की पवित्रता को वापस हासिल करने का है।
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प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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