August 29, 2026

*कानून से परे महिलाओं के लिए सुरक्षित माहौल बनाना ही रक्षा-बंधन की सच्ची सार्थकता होगी: रविन्द्र कुमार*

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​ #न्यूज़हाईलाइट्स:

👍​बदलता स्वरूप: रक्षा-बंधन अब केवल भाई-बहन के पारंपरिक रिश्ते तक सीमित न रहकर ‘परस्पर सशक्तिकरण’ और ‘समानता’ का साझा संकल्प बन रहा है।

👍​ऐतिहासिक संदर्भ: कृष्ण-द्रौपदी और रानी कर्णावती-हुमायूँ के प्रसंग सिद्ध करते हैं कि यह पर्व सदियों से संकीर्ण सीमाओं से परे सामाजिक सौहार्द का प्रतीक रहा है।

👍​बाज़ारवाद की चुनौती: ई-कॉमर्स और डिजिटल तकनीक ने दूरियाँ तो मिटाई हैं, लेकिन महंगे उपहारों और व्यावसायिकता के दिखावे ने पर्व की मूल सादगी को प्रभावित किया है।

👍​नए सरोकार: समाज में पर्यावरण संरक्षण (पेड़ों को राखी बाँधना) और महिला एकजुटता (बहनों द्वारा एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधना) जैसे नए व्यावहारिक आयाम जुड़ रहे हैं।

👍​मूल संदेश: पर्व की वास्तविक सार्थकता कानून से परे हर व्यक्ति, विशेषकर महिलाओं के लिए एक सुरक्षित, सम्मानित और भयमुक्त वातावरण निर्मित करने में है।

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भारतीय सांस्कृतिक चेतना का प्रमुख पर्व ‘रक्षा-बंधन’ आधुनिकता, तकनीक और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच अपने नए स्वरूप में उभर रहा है। सावन की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार अब केवल एक पारिवारिक रस्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बदलते सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं का एक व्यापक मंच बनता जा रहा है।

👍*​अतीत का कैनवास और ऐतिहासिक सरोकार*

ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टिकोण से रक्षा-बंधन का दायरा हमेशा से व्यापक रहा है। श्रीकृष्ण द्वारा द्रौपदी के विश्वास की रक्षा का अवसर हो या रानी कर्णावती द्वारा हुमायूँ को रक्षा-सूत्र भेजकर सुरक्षा की प्रतिबद्धता माँगना—इन घटनाओं ने दर्शाया है कि रक्षा-सूत्र केवल रक्त-संबंधों तक सीमित नहीं है। यह पर्व सदियों से जाति, धर्म और संकीर्ण सीमाओं से परे जाकर सामाजिक समरसता और परस्पर रक्षा के बोध को जीवित रखता आया है।

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👍*​पुरुष-प्रधान सोच से परे ‘परस्पर सशक्तिकरण’*

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे बड़ा बदलाव ‘रक्षा’ की परिभाषा में आया है। पारंपरिक रूप से इसे भाई द्वारा बहन को दिए जाने वाले ‘संरक्षण के वचन’ के रूप में देखा जाता था, लेकिन आज यह विचार ‘एकतरफा सुरक्षा’ से हटकर ‘परस्पर सशक्तिकरण’ में परिवर्तित हो चुका है। आधुनिक समाज में यह दो समान व्यक्तियों द्वारा एक-दूसरे के अधिकारों, सपनों, गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान करने का साझा संकल्प बन गया है। आज बहनें एक-दूसरे को राखी बाँधकर एकजुटता का संदेश दे रही हैं, वहीं पर्यावरण चेतना के तहत वृक्षों को रक्षा-सूत्र बाँधने का चलन भी बढ़ा है।

👍*​डिजिटल क्रांति और बाज़ारवाद का प्रभाव*

तकनीक के इस दौर में वीडियो कॉल और ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म्स ने भौगोलिक दूरियों को बेअसर कर दिया है, जिससे देश-विदेश में बैठे रिश्ते एक क्लिक पर जुड़ रहे हैं। हालांकि, इस तकनीकी सुगमता के साथ बाज़ारवाद का प्रभाव भी गहराई से महसूस किया जा रहा है। उपहारों की व्यावसायिक होड़ और महंगे दिखावे के कारण कई बार इस पावन पर्व का मूल तत्व—भावनात्मक आत्मीयता—पीछे छूटता नज़र आता है।

रक्षा-बंधन का मूल तत्व किसी महंगे उपहार या औपचारिक रस्म में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और परस्पर सम्मान में निहित है। बाज़ारवाद के इस दौर में यह आवश्यक है कि हम इस पर्व की आत्मिक ऊर्जा को पहचानें। ‘रक्षा’ का वास्तविक अर्थ केवल व्यक्तिगत सुरक्षा तक सीमित न रहकर समाज में हर नागरिक—विशेष रूप से महिलाओं—के लिए एक सुरक्षित, सम्मानित और भयमुक्त वातावरण तैयार करना है। जब तक समाज में गरिमा और उत्तरदायित्व का यह अदृश्य धागा मज़बूत रहेगा, तब तक इस पर्व की शाश्वत सार्थकता बनी रहेगी।

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रविन्द्र कुमार
रविन्द्र कुमार
प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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