*औरंगाबाद में बी.पी. मंडल जयंती पर मंथन: चुनाव में ‘राइट टू रिकॉल’ और ‘स्टेट फंडिंग’ लागू करने की उठी मांग*

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#न्यूज़हाईलाइट्स:
👍जयंती सह विचार गोष्ठी: औरंगाबाद के देवःकृति रिजॉर्ट में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व मंडल आयोग के अध्यक्ष स्वर्गीय बी.पी. मंडल की जयंती पर “चुनाव सुधार” विषय पर विचार गोष्ठी का आयोजन।
👍प्रमुख हस्तियों की मौजूदगी: पूर्व लोक अभियोजक व वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार सिंह के संयोजन में आयोजित कार्यक्रम में पूर्व सांसद वीरेंद्र कुमार सिंह, पूर्व विधायक वीरेंद्र कुमार सिंहा और रामबली सिंह समेत कई गणमान्य नागरिक शामिल हुए।
👍धनबल पर हमला: चुनावी व्यवस्था में बढ़ते पैसे के खेल पर चिंता जताते हुए कहा गया कि आज कर्पूरी ठाकुर जैसे सादगीपसंद जननेता चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं कर सकते।
👍प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल: आजादी के बाद और लालू प्रसाद के दौर की तुलना में वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में जनता और शीर्ष अधिकारियों (DM/SP) के बीच दूरी बढ़ने और भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी का मुद्दा उठा।
👍सुधार के 5 प्रमुख सुझाव: ‘राइट टू रिकॉल’ (प्रतिनिधित्व वापसी) कानून, चुनाव का पूरा खर्च सरकार द्वारा उठाना (स्टेट फंडिंग), राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र, अत्यधिक पैसा बहाने वाले प्रत्याशियों की अयोग्यता और सांसद-विधायक निधि (LAD Fund) को समाप्त करना।
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रविंद्र कुमार, संपादक/औरंगाबाद (बिहार)/26 अगस्त 2026 :: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं मंडल आयोग के अध्यक्ष स्वर्गीय बी.पी. मंडल की जयंती के अवसर पर औरंगाबाद स्थित देवःकृति रिजॉर्ट में “चुनाव सुधार” विषय पर एक दिवसीय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। औरंगाबाद के सुप्रसिद्ध अधिवक्ता एवं पूर्व लोक अभियोजक श्री प्रमोद कुमार सिंह द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जिले के विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों, अधिवक्ताओं और नागरिक समाज के प्रबुद्ध लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

विचार गोष्ठी को संबोधित करते हुए मगधांचल समग्र विकास समिति के अध्यक्ष डॉ. संजय रघुवर ने देश में चुनावी व्यवस्था के पूर्ण पुनर्गठन और इसके लिए व्यापक जनआंदोलन चलाने का आह्वान किया। डॉ. रघुवर ने कहा कि वर्तमान में देश की लोकसभा और राज्य विधानसभाएं ‘धनकुबेरों की बंधक’ बन चुकी हैं। अधिकांश प्रतिनिधि अरबपति और खरबपति हैं, जिन्हें समाज के वंचित और कमजोर वर्गों की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं रह गया है।

उन्होंने राजनीतिक दलों में टिकटों की खरीद-फरोख्त पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, “आज चुनाव इस कदर खर्चीला हो चुका है कि जननायक कर्पूरी ठाकुर जैसा ईमानदार और जनसमर्पित नेता भी चुनाव लड़ने की सोच नहीं सकता। लोकतंत्र गरीबों से लाखों मील दूर चला गया है।” इसके साथ ही उन्होंने राजनीति में पनप रहे परिवारवाद पर तीखा तंज कसते हुए कहा कि अब दलों के भीतर लोकतंत्र नाम मात्र का भी नहीं बचा है।

प्रशासनिक व्यवस्था में आए निगहबानी के पतन पर प्रकाश डालते हुए डॉ. रघुवर ने कहा कि अतीत में जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) अपने आवासीय कार्यालयों में नियमित रूप से आम जनता से मिलते थे, तब भ्रष्ट अधिकारियों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक होती थी। लेकिन आज स्थिति उलट है; आज ईमानदार अधिकारी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं और अधिकांश अधिकारी आम जनता की पहुंच से दूर हो चुके हैं।

👍*चुनाव सुधार के लिए प्रस्तुत प्रमुख प्रस्ताव*
चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और जनउन्मुखी बनाने के लिए डॉ. संजय रघुवर ने निम्नलिखित कदम उठाने पर बल दिया:
🌹प्रतिनिधित्व वापसी का कानून (Right to Recall): जनता को अपने निष्क्रिय या भ्रष्ट जनप्रतिनिधि को कार्यकाल के बीच में ही वापस बुलाने का संवैधानिक अधिकार मिले।
🌹चुनावी खर्च का सरकारीकरण (State Funding): चुनाव लड़ने का खर्च स्वयं सरकार उठाए और इसकी न्यूनतम सीमा तय की जाए।
🌹कड़ी कार्रवाई: चुनाव में सीमा से अधिक पानी की तरह पैसा बहाने वाले प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाए।
🌹आंतरिक लोकतंत्र व कैडर चयन: राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण अनिवार्य हो और उम्मीदवार का चयन दलों के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया (कैडर के बीच से) किया जाए।
🌹ऐच्छिक निधि की समाप्ति: सांसद एवं विधायक निधि (MP/MLA LAD Fund) को पूरी तरह समाप्त किया जाए, जो भ्रष्टाचार का मुख्य स्रोत बनी हुई है।
इस विचार गोष्ठी में पूर्व सांसद वीरेंद्र कुमार सिंह, ओबरा के पूर्व विधायक वीरेंद्र कुमार सिंहा (राजद), भाकपा (माले) के किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष व पूर्व विधायक रामबली सिंह समेत जिले भर के विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और चुनाव सुधार के मुद्दों पर अपनी सहमति व्यक्त की।

🌹*संपादकीय टिप्पणी*🌹
भारतीय लोकतंत्र आज जिन चुनौतियों से जूझ रहा है, उनमें चुनावी राजनीति में धनबल और बाहुबल का अत्यधिक वर्चस्व सबसे चिंताजनक है। औरंगाबाद में बी.पी. मंडल की जयंती पर आयोजित यह विचार गोष्ठी केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सेहत को लेकर की गई एक गंभीर शल्य-चिकित्सा जैसी है।
जब तक चुनाव लड़ने का पैमाना ‘समर्पण और योग्यता’ के बजाय ‘बैंक बैलेंस और वंशवाद’ बना रहेगा, तब तक आम नागरिक की आवाज नीति-निर्माण के पन्नों से गायब ही रहेगी। डॉ. संजय रघुवर द्वारा उठाए गए बिंदु—विशेष रूप से ‘राइट टू रिकॉल’, ‘स्टेट फंडिंग’ और ‘सांसद/विधायक निधि की समाप्ति’—ऐसे नीतिगत सुझाव हैं जिन पर संसद से लेकर गलियों तक बहस होना बेहद जरूरी है। यदि भारतीय लोकतंत्र को वास्तव में ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ बनाए रखना है, तो चुनावी सुधारों के इस आह्वान को एक बड़े राष्ट्रीय जनआंदोलन में बदलना ही होगा।
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