*भगवान बिरसा मुंडा के पैतृक गाँव में उपेक्षा पर ‘राम जानकी प्रगति सेवा संस्थान’ की सचिव अर्पणा बाला ने गहरी चिंता व्यक्त की*

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#न्यूज़हाईलाइट्स:
*पैतृक गाँव का दौरा*: राम जानकी प्रगति सेवा संस्थान की सचिव अर्पणा बाला ने बिरसा मुंडा के गाँव का लिया जायजा।
*नई पीढ़ी में जागरूकता का अभाव*: गाँव के बच्चों में ‘धरती आबा’ के संघर्ष और इतिहास के प्रति जानकारी शून्य पाई गई।

*संस्कृति और धर्मांतरण का संकट*: स्थानीय आदिवासी समाज के बीच बढ़ते धर्मांतरण और मूल धर्म से दूरी पर संस्थान ने जताई गंभीर चिंता।
*विरासत बचाने का संकल्प*: संस्थान ने आदिवासी इलाकों में बिरसा मुंडा के जीवन दर्शन और संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान की घोषणा की।
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रविंद्र कुमार, संपादक/रांची/15जून 2026 :: ‘धरती आबा’ के नाम से विख्यात भगवान बिरसा मुंडा की जन्मभूमि आज खुद अपनी पहचान और विरासत को लेकर संघर्ष कर रही है। हाल ही में ‘राम जानकी प्रगति सेवा संस्थान’ एवं ‘संभव’ की सचिव अर्पणा बाला ने अपने सहकर्मियों के साथ भगवान बिरसा मुंडा के पैतृक गाँव का दौरा किया। इस दौरान जो वस्तुस्थिति सामने आई, वह आदिवासी गौरव और इतिहास के संरक्षण को लेकर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है।
*इतिहास से कट रही नई पीढ़ी*

गाँव के बच्चों और युवाओं के साथ संवाद के दौरान अर्पणा बाला ने पाया कि उन्हें अपने महान नायक भगवान बिरसा मुंडा के संघर्षों की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। यहाँ तक कि स्थानीय पुस्तकालय में भी बिरसा मुंडा के जीवन और उनके ‘उलगुलान’ (क्रांति) से संबंधित पर्याप्त साहित्य का अभाव दिखा। अर्पणा बाला ने इस पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि, “जो नायक जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए शहीद हो गया, आज उसी की अपनी धरती पर लोग उनके बलिदान को भूल रहे हैं।”
*धर्मांतरण का बढ़ता खतरा*

गाँव के लोगों से बातचीत में सबसे चिंताजनक पहलू धर्मांतरण का उभरकर सामने आया। अर्पणा बाला ने बताया कि कई आदिवासी परिवार अपनी मूल परंपराओं और संस्कृति को छोड़कर दूसरे मजहब की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्होंने इसे बिरसा मुंडा के उन सिद्धांतों के विरुद्ध बताया, जिसके लिए उन्होंने अंग्रेजों और धर्मांतरण की शक्तियों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी।
*जागरूकता अभियान का शंखनाद*

संस्थान ने इस स्थिति को देखते हुए आदिवासी क्षेत्रों में एक बड़ा जागरूकता अभियान चलाने का संकल्प लिया है। अर्पणा बाला ने कहा कि, “हमारा उद्देश्य केवल इतिहास की याद दिलाना नहीं, बल्कि आदिवासियों को उनकी गौरवशाली संस्कृति, भाषा और परंपराओं से पुनः जोड़ना है।” संस्थान का मानना है कि यदि समय रहते नई पीढ़ी को अपने नायकों और संस्कारों से नहीं जोड़ा गया, तो वह विरासत पूरी तरह समाप्त हो जाएगी जिसे बिरसा मुंडा ने अपने लहू से सींचा था।
🌹*संपादकीय टिप्पणी*🌹

किसी भी समाज की शक्ति उसके इतिहास और जड़ों से जुड़ी होती है। भगवान बिरसा मुंडा केवल एक नाम नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान का पर्याय हैं। यदि उनके पैतृक स्थान पर ही उनके नाम और काम की उपेक्षा हो रही है, तो यह सांस्कृतिक क्षरण का संकेत है। धर्मांतरण का मुद्दा यहाँ केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का है। ‘राम जानकी प्रगति सेवा संस्थान’ की यह चिंता मौजूं है कि क्या हम अपने नायकों के बलिदान को व्यर्थ जाने दे रहे हैं? ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण का अर्थ केवल स्मारक बनाना नहीं, बल्कि उन विचारों को जीवित रखना है जिनके लिए महापुरुषों ने अपना जीवन न्यौछावर किया।
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