July 16, 2026

*पुनीता कुमारी श्रीवास्तव की नई कविता ‘मन की उलझनें और अंतरद्वंद’ में जीवन के गहन दर्शन की झलक*

 

रविंद्र कुमार,संपादक/​पटना /16 जुलाई 2026 ::​​ पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय की पीएचडी रिसर्च स्कॉलर पुनीता कुमारी श्रीवास्तव ने अपनी नवीनतम कविता “मन की उलझनें और अंतरद्वंद” के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और मानसिक संघर्षों का एक सुंदर खाका खींचा है। यह कविता उन तमाम अनकहे सवालों को शब्द देती है, जो हर व्यक्ति के मन के किसी न किसी कोने में पल रहे होते हैं।

👍*​कविता के मुख्य अंश*

​लेखिका ने अपनी पंक्तियों में बताया है कि किस प्रकार मन ‘मित्र’ और ‘शत्रु’ दोनों की भूमिका निभाता है। कविता में संघर्ष, आशा, संदेह और अंततः आत्म-साक्षात्कार की यात्रा को बहुत ही मार्मिक ढंग से पिरोया गया है। लेखिका ने स्पष्ट किया है कि मन की उलझनें केवल परेशानी का कारण नहीं हैं, बल्कि ये एक ‘शिक्षक’ की भांति हमें धैर्य और आत्म-बोध सिखाती हैं।

👍*​साहित्यिक विश्लेषण*

​पुनीता कुमारी श्रीवास्तव ने लिखा है कि जीवन का वस्त्र ‘अंतर्द्वंद्व के धागों’ से बुना जाता है। यह रचना पाठकों को यह संदेश देती है कि मन की इस अग्नि में तपकर ही व्यक्तित्व खरा सोना बनकर निकलता है। कविता का समापन अत्यंत सकारात्मक है, जहाँ लेखिका कहती हैं कि उलझनों के शोर से डरने के बजाय, उसे नए जीवन की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए।

🌹*​संपादकीय टिप्पणी*🌹

​पुनीता कुमारी श्रीवास्तव की यह रचना आज के भागदौड़ भरे और तनावपूर्ण जीवन में एक ‘आत्म-चिंतन’ का आईना है। मन के भीतर चलने वाला द्वंद्व हर किसी का अपना होता है, लेकिन उसे इस तरह शब्दों में ढालना कि वह सार्वभौमिक लगने लगे, लेखिका की परिपक्वता को दर्शाता है। यह कविता केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करती है। यह याद दिलाती है कि हमारे भीतर का अंधकार ही हमें प्रकाश की खोज के लिए प्रेरित करता है।

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रविन्द्र कुमार
रविन्द्र कुमार
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