*मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन रद्द होने से जुड़ी याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर जदयू प्रवक्ता राजीव रंजन बोले—”न्यायालय पर सवाल उठाना दुर्भाग्यपूर्ण”*

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#न्यूज़हाईलाइट्स:
*सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की राज्यसभा नामांकन रद्द करने के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है।
*न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 329 के तहत चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद हस्तक्षेप की सीमित गुंजाइश है और याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
*जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाने के लिए कांग्रेस की आलोचना करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
*कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए उसे “पूरी तरह से समझौतावादी” (compromised) करार दिया है।
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रविंद्र कुमार,संपादक /पटना 15 जून 2026 :: कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन को उस समय बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन पत्र के खारिज होने के खिलाफ दायर याचिका को सुनने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, हालाँकि कोर्ट ने उन्हें चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित उच्च न्यायालय में चुनाव याचिका दायर करने की छूट दी है।
इस मामले पर बिहार की राजनीति में भी प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस की असहजता पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस और मीनाक्षी नटराजन देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले से सहमत नहीं हैं, तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति कांग्रेस के अविश्वास के रूप में देखा।
गौरतलब है कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा इस आधार पर खारिज किया गया था कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में एक लंबित आपराधिक मामले का खुलासा नहीं किया था। कोर्ट ने अपने आदेश में दोहराया कि फॉर्म 26 के तहत खुलासे की आवश्यकताएं अनिवार्य हैं और उम्मीदवारों को अपने हलफनामे में पूर्ण विवरण देना होता है। फैसले के बाद नटराजन ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि यह संस्था “समझौतावादी” हो गई है और पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही है।
🌹*संपादकीय टिप्पणी*🌹
किसी भी लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं और न्यायालयों की गरिमा सर्वोपरि होती है। मीनाक्षी नटराजन मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार करना चुनाव कानून के उस स्थापित सिद्धांत को पुष्ट करता है जिसके तहत चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित रखा जाता है। हालाँकि, किसी राजनीतिक दल का अपनी असहमति जाहिर करना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन न्यायालय के फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाना राजनीतिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। यह घटनाक्रम चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी हलफनामों में पारदर्शिता के मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आया है। 
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