*काशी के मणिकर्णिका घाट पर होने वाली ‘मसान होली’ पर छिड़ा महासंग्राम : आस्था या आधुनिक आडंबर ? डोम समाज और विद्वानों ने की प्रतिबंध की मांग*
*वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार सिन्हा की विशेष रिपोर्ट*
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*न्यूज़ हाइलाइट्स (News Highlights)*
*परंपरा पर प्रश्नचिह्न: काशी विद्वत परिषद के अनुसार, किसी भी पुराण या धर्मग्रंथ में ‘मसान होली’ का उल्लेख नहीं है; इसे हाल के वर्षों में निर्मित प्रथा बताया*
*डोम समुदाय का आक्रोश: शवदाह के लिए आने वाले शोकाकुल परिवारों को भारी भीड़ के कारण 5 से 10 घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है*
*मर्यादा का उल्लंघन: आयोजन के दौरान हुड़दंग, शोर-शराबे और नशाखोरी के गंभीर आरोप; श्मशान की शुचिता पर संकट*
*प्रशासनिक चुनौती: पिछले वर्ष जुटे थे 4 लाख लोग; इस बार सुरक्षा और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती*
*डिजिटल रील संस्कृति: सोशल मीडिया और व्लॉगिंग के कारण पवित्र परंपराओं के ‘इवेंट’ में तब्दील होने पर चिंता जताई गई*
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वाराणसी/पटना | 27 फरवरी, 2026 :: मोक्ष की नगरी काशी का मणिकर्णिका घाट इन दिनों भक्ति और विवाद के दोराहे पर खड़ा है। शनिवार, 28 फरवरी को प्रस्तावित विश्व प्रसिद्ध ‘मसान होली’ (चिता भस्म की होली) को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। जहाँ एक पक्ष इसे शिव-गणों की परंपरा बता रहा है, वहीं घाट के संरक्षक ‘डोम राजा’ परिवार और ‘काशी विद्वत परिषद’ ने इसे शास्त्र-विरुद्ध और असंवेदनशील करार देते हुए प्रशासन से इस पर अविलंब रोक लगाने की मांग की है।

*क्या है मसान होली की परंपरा ?*
मान्यताओं के मुताबिक, भगवान शिव विवाह के पश्चात रंगभरी एकादशी पर माता गौरी को काशी लाए थे. पौराणिक कथाओं के मुताबिक शिव के गण बारात में नहीं जा सके, जिससे वे आहत हुए. उनकी इच्छा पूरी करने के लिए महाश्मान में चिता की राख से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई.
बीतते समय के साथ अघोरी और तांत्रिक परंपराओं से जुड़ा यह आयोजन विस्तार होते चला गया.
साल 2009 के बाद बाबा महाश्मशान मंदिर मैनेजमेंट कमेटी के प्रशासक गुलशन कपूर ने इसे व्यवस्थित रूप दिया, जिसके बाद यग आयोजन देश के साथ विदेश में भी काफी चर्चा में रहा. हर साल हजारों लोग इस भव्य नजारे को देखने के लिए पहुंचते हैं, जिसका पंचांगों में भी उल्लेख है.
*आस्था और संवेदनशीलता का टकराव*
काशी विद्वत परिषद के सचिव राम नारायण द्विवेदी ने स्पष्ट किया है कि श्मशान को उत्सव स्थल बनाना शास्त्रसम्मत नहीं है। उनके अनुसार, यह आयोजन प्राचीन परंपरा नहीं बल्कि हाल के वर्षों में प्रचारित एक ‘इवेंट’ मात्र है। दूसरी ओर, आयोजकों का तर्क है कि रंगभरी एकादशी के अगले दिन भगवान शिव अपने गणों के साथ मसान में होली खेलते हैं, जो उनके अघोर रूप की अभिव्यक्ति है।

*अंतिम संस्कार में बाधा*
विवाद का सबसे मानवीय पक्ष डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी ने उठाया है। उन्होंने प्रशासन को दिए पत्र में कहा है कि मणिकर्णिका घाट कोई पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि मोक्ष की भूमि है। होली के नाम पर जुटने वाली लाखों की भीड़ के कारण दूर-दराज से आए शवयात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। चिताओं के बीच नाच-गाना और हुड़दंग उन परिवारों की पीड़ा का अपमान है जो अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देने आए हैं।
*इवेंट मैनेजमेंट और सोशल मीडिया का प्रभाव*
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में ‘धार्मिक पर्यटन’ के नाम पर मसान होली का स्वरूप बदला है। सेल्फी, रील्स और व्लॉग्स की होड़ ने इसे एक ‘डिजिटल शोकेस’ बना दिया है, जिससे इसकी आध्यात्मिक गंभीरता कम हुई है और प्रदर्शन बढ़ गया है।

*प्रशासन की दुविधा*
वाराणसी जिला प्रशासन फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में है। हालांकि औपचारिक प्रतिबंध की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार, आयोजन को सीमित क्षेत्र में करने, समय सीमा (दोपहर 12 से 2 बजे) तय करने और ड्रोन से निगरानी रखने जैसे सख्त नियम लागू किए जा सकते हैं।

निष्कर्ष के रूप में यह विवाद केवल एक आयोजन का नहीं, बल्कि काशी की सनातन मर्यादा बनाम आधुनिक प्रदर्शनवाद का है। क्या किसी की आस्था, दूसरे की अंतिम विदाई की शांति से बड़ी हो सकती है? काशी की आत्मा समन्वय में है, और अब गेंद प्रशासन के पाले में है कि वह ‘मोक्ष भूमि’ की गरिमा को कैसे सुरक्षित रखता है।
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