*”यह पुस्तक उन सभी की है जो भारत को केवल वर्तमान में नहीं, बल्कि भविष्य के सपने के रूप में देखते हैं”– विनय श्रीवास्तव*

रविंद्र कुमार,संपादक/पटना/नई दिल्ली/14 जनवरी 2026 :: समकालीन भारतीय राजनीति के पिछले दो दशकों को अक्सर ध्रुवीकरण और पक्ष-विपक्ष के चश्मे से देखा जाता रहा है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकार विनय श्रीवास्तव की पहली पुस्तक ‘मन-मोदी’ इस शोर के बीच एक शांत और संतुलित विमर्श लेकर आई है। यह पुस्तक केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की उस निरंतरता का दस्तावेज है जो डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल से शुरू होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के युग तक अनवरत जारी है।

**सत्ता की आलोचना नहीं,राष्ट्रीयता का दस्तावेजीकरण**
जिज्ञासा प्रकाशन, गाजियाबाद द्वारा प्रकाशित यह कृति किसी राजनीतिक विचारधारा का महिमामंडन या आलोचना करने के बजाय ‘नीति के पीछे की नीयत’ को टटोलती है। लेखक विनय श्रीवास्तव के अनुसार, ‘मन-मोदी’ पाठकों पर कोई निर्णय नहीं थोपती, बल्कि उन्हें पिछले 20 वर्षों के भारत को ठहरकर देखने और महसूस करने का अवसर देती है।

*******दो दशक, दो व्यक्तित्व, एक लक्ष्य********
पुस्तक की मुख्य विशेषता इसका संतुलन है। पुस्तक “मन-मोदी” रेखांकित करती है कि:
**निरंतरता: शासन की शैलियां बदलीं, चुनौतियां बदलीं, लेकिन ‘विकसित भारत’ का संकल्प एक साझा सूत्र की तरह दोनों प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में मौजूद रहा।

**लोकतांत्रिक परिपक्वता: यह पुस्तक दर्शाती है कि लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है, बल्कि यह जनता की उम्मीदों और धैर्य की एक सतत परीक्षा है।
**पूर्वाग्रह से मुक्ति: लेखक ने एक पत्रकार की तटस्थता और एक संवेदनशील नागरिक की दृष्टि के बीच सुंदर समन्वय बिठाया है, जिससे पाठक स्वयं निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र रहता है।

***साहित्यिक गहराई और पत्रकारिता का अनुभव***
विनय श्रीवास्तव के वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपे उनके लेखों ने इस पुस्तक की नींव तैयार की है। पुस्तक की भाषा सहज और प्रवाहपूर्ण है, जो जटिल राजनीतिक निर्णयों को भी एक सामाजिक संवाद के रूप में प्रस्तुत करती है।
पुस्तक “मन -मोदी” के लेखक विनय श्रीवास्तव ने अपनी पुस्तक के बारे में लिखा हैं कि “यह पुस्तक सत्ता के गलियारों से अधिक, जन-मन की धड़कनों से संवाद करती है। यह उन सभी की है जो भारत को केवल वर्तमान में नहीं, बल्कि भविष्य के सपने के रूप में देखते हैं।”
राजनीतिक विश्लेषकों और गंभीर पाठकों के बीच इसकी परिपक्वता और ईमानदारी को लेकर चर्चा का विषय बना हुआ है
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