*बहादुर शाह ज़फ़र के 250 वें जन्मदिन पर बे-नज़ीर अन्सार सोसाइटी द्वारा भव्य आयोजन,15 दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रस्ताव पारित*

भोपाल/25 अक्टूबर 2025**:: स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा बहादुर शाह ज़फ़र के 250वें जन्मदिन पर बे-नज़ीर अन्सार एजुकेशनल ऐंड सोशल वेलफेयर सोसाइटी ने शनिवार को एक शानदार कार्यक्रम का आयोजन किया। सोसाइटी ने अपील की कि 24 अक्टूबर (जन्मदिन) से 7 नवंबर (पुण्यतिथि) तक 15 दिवसीय सांस्कृतिक व शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएं, जिसमें स्थानीय स्तर पर सेमिनार, वर्कशॉप और युवाओं के लिए जागरूकता सत्र शामिल हों।

कार्यक्रम में शिरकत करने वालों ने इस प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन किया और पूरे देश में सामूहिक रूप से इसे लागू करने का संकल्प लिया। सोसाइटी के अध्यक्ष एम. डब्ल्यू. अन्सारी ने कहा कि बहादुर शाह ज़फ़र न केवल मुगल सम्राट थे, बल्कि एक महान शायर, राष्ट्र सुधारक और उत्पीड़ितों की आवाज थे। उन्होंने तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, तांत्या भील जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र करते हुए बताया कि ज़फ़र 1857 की क्रांति के सर्वोच्च कमांडर थे। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सबको एकजुट किया, जो आजादी के पहले संयुक्त नेतृत्व का उदाहरण है।

अन्सारी ने सिराजुद्दौला और टीपू सुल्तान जैसे अन्य नायकों को भी श्रद्धांजलि दी, जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया। उन्होंने जोर दिया कि युवा पीढ़ी को उनकी शायरी, वीरता और मानवीय भावनाओं से जोड़ना जरूरी है, ताकि राष्ट्र अपनी इतिहास से जुड़े रहे।

प्रसिद्ध पत्रकार व शोधकर्ता डॉ. महताब आलम ने कहा कि आजादी के बाद मुसलमान पिछड़ गए क्योंकि उन्होंने अपने पूर्वजों की कुर्बानियों को भुला दिया। हमें खुद अपनी तारीख याद रखनी चाहिए। उन्होंने शेर सुनाते हुए कहा: “नैरंगी-ए-सियासत-ए-दौराँ तो देखिए, मंज़िल उन्हें मिली जो शरीक़-ए-सफ़र न थे।” डॉ. महताब ने सोसाइटी के 15 दिवसीय कार्यक्रम का स्वागत किया, इसे मील का पत्थर बताया।

सामाजिक कार्यकर्ता सादिक अली ने कहा कि ज़फ़र एकता व सहिष्णुता के प्रतीक थे, जिन्हें हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों में सम्मान मिला। उन्होंने ऐतिहासिक गलतफहमियों पर चिंता जताई और कहा कि तारीख पढ़कर ही प्रोपगैंडा का मुकाबला किया जा सकता है। ज़फ़र की सेवाओं, साहित्यिक योगदान और देशभक्ति को ऐतिहासिक नजरिए से प्रस्तुत करना चाहिए।

कार्यक्रम बेहद सफल रहा। सरदार खान जैसे प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता, स्थानीय मीडिया, साहित्यिक व शैक्षिक हलकों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में शहरवासी उपस्थित हुए। अंत में अन्सारी ने सभी का आभार माना और सोसाइटी ने बहादुर शाह ज़फ़र की स्मृति को जीवित रखने के लिए आगे शैक्षिक अभियान चलाने का ऐलान किया।
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