*सनातन गुरु परंपरा में स्वामी शिवानंद सरस्वती के परम शिष्य हैं — स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती*

*लेखक: अवधेश झा, ट्रस्टी एवं मुख्य समन्वयक, ज्योतिर्मय ट्रस्ट (यूनिट ऑफ योग रिसर्च फाउंडेशन, मियामी, फ्लोरिडा, यूएसए)*
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु पूर्णिमा उस दिव्य परंपरा का उत्सव है, जिसमें हम अपने जीवन को आलोकित करने वाले गुरु के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह परंपरा केवल शिक्षण तक सीमित नहीं, अपितु आत्मज्ञान और मोक्षमार्ग का प्रकाश है। इसी सनातन गुरु-शिष्य परंपरा में स्वामी शिवानंद सरस्वती जैसे युगद्रष्टा संत के परम शिष्य के रूप में प्रतिष्ठित हैं — स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती।

मुंडक उपनिषद् (1.2.12) कहता है:
“तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्। समित्वपनिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥”
इस श्लोक में उपनिषदों ने स्पष्ट किया है कि ब्रह्मविद्या को जानने के लिए साधक को श्रुति में पारंगत और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के शरण में जाना चाहिए। यही परंपरा स्वामी शिवानंद जी और उनके शिष्य स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी के संबंध में भी दृष्टिगोचर होती है।

स्वामी शिवानंद सरस्वती — योग और वेदांत के युगपुरुष थे तथा आध्यात्मिक जीवन, सेवा, साधना और आत्मज्ञान के मार्ग को जनसामान्य के लिए सुलभ बनाया। उन्होंने ‘दिव्य जीवन मिशन’ (Devine life Society) की स्थापना कर विश्वभर में वेदांत, योग और अध्यात्म का प्रचार किया। उनका प्रसिद्ध वाक्य — “Serve, Love, Meditate, Realize” आज भी साधकों के लिए मूलमंत्र है।
उन्हीं के पदचिह्न पर चलने वाले शिष्यों में एक स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती —जीवन के प्रारंभ में गुरु की छाया में तपस्वी जीवन व्यतीत किए, तदुउपरांत स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी ने ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद जी की सान्निध्यता में कठोर तप, स्वाध्याय और सेवा से आत्मज्ञान की ऊँचाइयों को छुआ। वे न केवल उनके शिष्य रहे, बल्कि उनके तत्वदर्शन के जीवंत वाहक भी बने। गुरु की कृपा से ही वे बाद में अमेरिका गए और वहाँ भारतीय अध्यात्म, योग और वेदांत दर्शन की ज्योति को विश्वभर में प्रज्वलित की।
गुरु आज्ञा का वैश्विक रूपांतरण करते हुए, स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी ने गुरु की ज्ञान को आत्मसात किया तथा उसे वैश्विक धरातल पर प्रस्तुत किया। साठ के दशक में मियामी (फ्लोरिडा, USA) में उन्होंने Yoga Research Foundation की स्थापना किया और योग, वेदांत दर्शन पर 80 से ज्यादा पुस्तकें लिखा। यह कार्य गुरु-शक्ति की प्रेरणा से ही संभव हुआ। उन्होंने शिवानंद परंपरा की आधुनिक व्याख्या अपने ग्रंथों में किया है — Mysticism of the Bhagavad Gita, Essence of the Upanishads, Philosophy and Psychology of Yoga आदि में शिवानंदीय दृष्टिकोण को आधुनिक जीवन से जोड़ा गया है। उन्होंने गुरु के विचारों को केवल दोहराया नहीं, बल्कि उन्हें साधक के जीवन में उतारने योग्य बनाया।
गुरु-शिष्य संबंध का आदर्श रूप:
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी इस मंत्र को जीवन का आधार मानते हैं। उन्होंने अपने गुरु को साक्षात् ब्रह्म रूप में देखा और उन्हीं की प्रेरणा से जीवन समर्पित किया। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि सच्चा शिष्य वही है जो गुरु के वाक्य को ब्रह्म संकल्प की तरह निभाए।
गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी एक सनातन गुरु परंपरा की उस अखंड ज्योति का पूजन है जो स्वामी शिवानंद जी से प्रज्वलित हुई और स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी के माध्यम से आज भी संसार को आलोकित कर रही है। वे इस युग में गुरु-भक्ति, सेवा और वेदांत साधना का आदर्श उदाहरण हैं।
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