June 16, 2026

*वर्क फ्रॉम होम का मानसिक साइड इफेक्ट: युवाओं में बढ़ रहा अकेलापन और चिड़चिड़ापन*

*विस्तार से बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार सिंहा*

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​ #न्यूज़हाईलाइट्स:

*​मानसिक स्वास्थ्य पर असर*: प्रतिष्ठित पत्रिका ‘साइंस’ के शोध के अनुसार, वर्क फ्रॉम होम (WFH) कर्मचारियों, विशेषकर युवाओं में तनाव, चिंता और अकेलापन बढ़ा रहा है।

*​शोध का आधार*: अमेरिका में 5.80 लाख कर्मचारियों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि रिमोट वर्क मानसिक परेशानी के मामलों में बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारक है।

*​सामाजिक अलगाव*: घर से काम करने वाले कर्मचारी प्रतिदिन औसतन 1.1 घंटे अधिक अकेले बिताते हैं, जिससे उनमें सामाजिक संपर्क का अभाव हो जाता है।

*​भारत में स्थिति*: भारत में भी निमहंस और डेलॉयट के सर्वे में 35% कर्मचारियों ने अकेलापन और 47% ने वास्तविक दुनिया से कटाव महसूस करने की बात स्वीकार की है।

*​समाधान की ओर*: विशेषज्ञों ने मानसिक संतुलन के लिए ‘हाइब्रिड वर्क मॉडल’ को सबसे प्रभावी विकल्प बताया है।

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पटना /16 जून 2026 :: कोरोना महामारी के बाद वैश्विक कार्य संस्कृति में आया ‘वर्क फ्रॉम होम’ का दौर अब एक बड़ी बहस का विषय बन गया है। जहाँ इस व्यवस्था ने समय और यात्रा की बचत जैसे लाभ दिए हैं, वहीं हालिया वैज्ञानिक शोधों ने इसके गंभीर मानसिक दुष्प्रभावों की ओर इशारा किया है।

*​युवाओं पर गहराता संकट*

येल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा की गई स्टडी में यह स्पष्ट हुआ है कि रिमोट वर्क का सबसे बुरा असर युवाओं पर पड़ रहा है। करियर की शुरुआत में नेटवर्किंग और टीम वर्क सीखने के अवसरों से वंचित रहने के कारण युवा कर्मचारी असुरक्षा और अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। सामाजिक मेलजोल की कमी उनके पेशेवर कौशल विकास को भी बाधित कर रही है।

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*​स्क्रीन टाइम और ‘ज़ूम फटीग’ का बोझ*

लगातार लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहने के कारण कर्मचारियों में ‘ज़ूम फटीग’ (वीडियो मीटिंग की थकान) जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं। साथ ही, घर और कार्यालय की सीमाएं समाप्त होने से कर्मचारी देर रात तक काम के दबाव में रहते हैं, जिससे उनकी नींद और मानसिक शांति प्रभावित हो रही है।

*​भारतीय संदर्भ में चुनौतियां*

भारत के आईटी और बीपीओ सेक्टर में भी इसी तरह की चिंताजनक स्थिति है। भारतीय संस्कृति, जो पारंपरिक रूप से सामूहिक और पारिवारिक मूल्यों पर आधारित है, वहाँ सामाजिक संपर्क की कमी लोगों को अवसाद की ओर धकेल रही है। सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में कर्मचारी वास्तविक दुनिया से जुड़ाव की कमी महसूस कर रहे हैं।

*​हाइब्रिड मॉडल ही भविष्य की राह*

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्क फ्रॉम होम को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन इसका असंतुलित उपयोग खतरनाक है। भविष्य की राह ‘हाइब्रिड वर्क मॉडल’ है, जहाँ कार्यालय और घर के बीच एक उचित तालमेल हो। यह मॉडल न केवल उत्पादकता बनाए रखने में सहायक है, बल्कि कर्मचारियों के सामाजिक स्वास्थ्य को भी सुरक्षित रखता है।

🌹*​संपादकीय टिप्पणी*🌹

​तकनीक ने काम करने के तरीकों को आसान तो बनाया है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जुड़ाव की जगह कोई डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं ले सकता। कंपनियों को अब ‘उत्पादकता’ के साथ-साथ ‘कर्मचारी कल्याण’ के बीच संतुलन बनाने की सख्त जरूरत है। वर्क फ्रॉम होम को एक अनिवार्य सुविधा के बजाय एक लचीले विकल्प के रूप में देखना ही मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा का एकमात्र उपाय है। संतुलित जीवनशैली और ‘ऑफ-लाइन’ समय का महत्व समझना अब समय की मांग बन गया है।

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रविन्द्र कुमार
रविन्द्र कुमार
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