🌹🙏🌹विनम्र श्रद्धांजलि🌹🙏🌹

*हमारे संपादक रविंद्र कुमार द्वारा सरला माहेश्वरी जी को श्रद्धांजलि देते हुए आज की पत्रकारिता के बदलते मूल्यों का एक विशेष विश्लेषण”*

पटना /नई दिल्ली/13 फरवरी 2026 :: भारतीय टेलीविजन समाचार जगत के ‘गोल्डन एरा’ का एक चमकता सितारा गुरुवार, 12 फरवरी 2026 को अस्त हो गया। दूरदर्शन की प्रतिष्ठित समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी ने 71 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही उस दौर का एक अध्याय समाप्त हो गया है, जहाँ एंकर की पहचान चिल्लाने से नहीं, बल्कि अपनी सौम्यता और भाषा पर पकड़ से होती थी।

*श्रद्धांजलि: “शालीनता की साक्षात मूर्ति”*
सरला जी के सहयोगी और मशहूर एंकर शम्मी नारंग ने अत्यंत भावुक संदेश में उन्हें याद करते हुए कहा, “वे न केवल दिखने में सुंदर थीं, बल्कि उनका व्यक्तित्व और ज्ञान का भंडार भी अद्भुत था। दूरदर्शन की स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति एक आकर्षण पैदा करती थी।” ऑल इंडिया महिला कांग्रेस सहित कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने उनके निधन को पत्रकारिता के लिए एक अपूरणीय क्षति बताया है। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार शाम 4 बजे निगम बोध घाट पर संपन्न हुआ।
*पत्रकारिता: तब और अब (एक तुलनात्मक विश्लेषण)*
सरला माहेश्वरी जी का जाना हमें उस दौर की याद दिलाता है जब पत्रकारिता ‘सूचना’ का माध्यम थी, न कि ‘मनोरंजन’ का। उनके समय और वर्तमान दौर की पत्रकारिता में जो बड़े बदलाव आए हैं, वे विचारणीय हैं:

*मानक* *सरला माहेश्वरी का दौर* *वर्तमान डिजिटल दौर*
1.*प्रस्तुतीकरण* तब सौम्यता, स्थिरता व संतुलित आवाज, परन्तु आज शोर, आक्रामकता और हाई-डेसिबल डिबेट.
2.*विषय वस्तु* तब केवल महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय खबरें। आज सनसनीखेज खबरें, वायरल वीडियो और टीआरपी की होड़।

3*एंकर की भूमिका* तब एंकर ‘खबर की विश्वसनीयता’ का प्रतीक था। आज एंकर अक्सर एक ‘एक्टिविस्ट’ या ‘इन्फ्लुएंसर’ की भूमिका में है।
4.*तकनीक बनाम साख* तब तकनीक सीमित थी, पर ‘शब्दों की मर्यादा’ सर्वोच्च थी। आज तकनीक (AI, 3D ग्राफिक्स) उन्नत है, पर ‘तथ्यों की शुद्धता’ पर सवाल हैं।
5.*दर्शकों का जुड़ाव* तब दर्शक एंकर पर ‘भरोसा’ करते थे। आज दर्शक अक्सर अपनी ‘विचारधारा’ के अनुसार चैनल चुनते हैं।

*खबरों की मर्यादा का प्रतीक*
सरला माहेश्वरी उस दौर की प्रतिनिधि थीं जब समाचार पढ़ना एक ‘संस्कार’ माना जाता था। उनकी आवाज़ में एक ऐसी शांति थी, जो सूचनाओं के बोझ को भी सहज बना देती थी। वर्तमान समय में जहाँ समाचारों में ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ का शोर हावी है, वहीं सरला जी का अंदाज सिखाता है कि पत्रकारिता का असली उद्देश्य जनहित और सत्य की गरिमा को बनाए रखना है।

सरला माहेश्वरी का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उस ‘विश्वसनीयता’ के अहसास का धुंधला होना है, जिसने टीवी पत्रकारिता की नींव रखी थी। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव यह मिसाल रहेंगी कि पत्रकारिता में चमक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण ‘चरित्र’ और ‘शालीनता’ होती है।
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