*तंत्र, शक्ति और इतिहास का – अद्भुत संगम है – “भेड़ाघाट का 64 योगिनी मंदिर”*

जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना, 05 जनवरी 2026 :: मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में नर्मदा नदी के तट पर स्थित भेड़ाघाट अपने संगमरमर की चट्टानों और धुआंधार जलप्रपात के लिए विश्वप्रसिद्ध है। इसी भेड़ाघाट की पहाड़ी पर स्थित 64 योगिनी मंदिर भारतीय तांत्रिक परंपरा, शक्ति उपासना और प्राचीन स्थापत्य का एक अद्वितीय उदाहरण है। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय इतिहास, समाज, दर्शन और कला का जीवंत दस्तावेज है।

64 योगिनी मंदिर को “चौंसठ योगिनी मंदिर” भी कहा जाता है। यह भारत के उन गिने-चुने योगिनी मंदिरों में से एक है, जो आज भी अपेक्षाकृत सुरक्षित अवस्था में विद्यमान हैं। इस मंदिर से जुड़ी मान्यताएँ, लोककथाएँ और ऐतिहासिक तथ्य इसे और भी रहस्यमय बनाता है।
योगिनियाँ शक्ति की प्रतीक मानी जाती हैं। तांत्रिक ग्रंथों के अनुसार, योगिनियाँ देवी के विविध रूप हैं, जो ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन्हें शिव की शक्तियाँ भी कहा जाता है। योगिनियों की संख्या सामान्यतः 64 मानी जाती है, हालांकि कुछ ग्रंथों में 81 या उससे अधिक योगिनियों का भी उल्लेख मिलता है। प्रत्येक योगिनी का एक विशिष्ट स्वरूप, वाहन, मुद्रा और तांत्रिक महत्व होता है।

तंत्र परंपरा में योगिनियों की उपासना अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। माना जाता है कि योगिनी साधना से साधक को असाधारण शक्तियाँ, ज्ञान और आत्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यही कारण है कि योगिनी मंदिर प्रायः एकांत स्थानों, पहाड़ियों या जंगलों में बनाए गए हैं।

इतिहासकारों के अनुसार, भेड़ाघाट स्थित 64 योगिनी मंदिर का निर्माण 10वीं या 11वीं शताब्दी में हुआ था। इसे कलचुरी वंश से जोड़ा जाता है, जिसकी राजधानी त्रिपुरी (वर्तमान जबलपुर क्षेत्र) थी। कलचुरी शासक कला, संस्कृति और धार्मिक सहिष्णुता के लिए प्रसिद्ध था। उनके शासनकाल में शैव, वैष्णव और शाक्त परंपराओं का समान रूप से विकास हुआ था। माना जाता है कि कलचुरी शासक युवराजदेव या उनके उत्तराधिकारियों ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। हालांकि, इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद भी हैं।

भेड़ाघाट का 64 योगिनी मंदिर पूर्णतः गोलाकार है। यह विशेषता इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती है। मंदिर के मध्य में एक खुला प्रांगण है और उसके चारों ओर 64 कोष्ठक (छोटे-छोटे मंदिरनुमा कक्ष) बने हुए हैं। प्रत्येक कोष्ठक में एक योगिनी की प्रतिमा स्थापित थी। वर्तमान में कुछ प्रतिमाएँ क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं, लेकिन उनकी कलात्मकता आज भी स्पष्ट दिखाई देती है।

मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में है। यह वास्तुशास्त्र के अनुरूप माना जाता है, क्योंकि पूर्व दिशा को ऊर्जा और प्रकाश का स्रोत माना गया है। योगिनी मंदिरों की एक विशेषता यह भी है कि इसके मध्य में प्रायः भैरव या शिव की प्रतिमा होती है। भेड़ाघाट के मंदिर में भी केंद्र में शिव से जुड़ा एक प्रतीकात्मक स्थान माना जाता है। यह शिव-शक्ति के अद्वैत सिद्धांत को दर्शाता है।

योगिनी प्रतिमाएँ सामान्य देवी-देवताओं से भिन्न होती हैं। इनमें से कई प्रतिमाएँ उग्र स्वरूप में हैं, जिनमें भयानक मुख, विकराल नेत्र और विचित्र आभूषण दिखाई देता है। कुछ योगिनियाँ पशु-वाहनों पर सवार हैं, तो कुछ के हाथों में खोपड़ी, त्रिशूल या अन्य तांत्रिक प्रतीक हैं। योगिनी प्रतिमाएँ स्त्री शक्ति की स्वतंत्र और प्रबल अभिव्यक्ति हैं। ये प्रतिमाएँ उस काल की सामाजिक और धार्मिक सोच को दर्शाती हैं, जिसमें नारी शक्ति को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्रोत माना गया है।

योगिनी मंदिरों को तांत्रिक साधना के केंद्र माना जाता था। यहाँ विशेष अनुष्ठान, रात्रिकालीन पूजा और मंत्र साधना की जाती थी। लोकमान्यताओं के अनुसार, आज भी अमावस्या या विशेष तांत्रिक तिथियों पर इस मंदिर में अद्भुत ऊर्जा का अनुभव किया जा सकता है। कुछ लोग इसे आध्यात्मिक चेतना का केंद्र मानते हैं, तो कुछ इसे रहस्य और चमत्कार से जोड़ते हैं।
नर्मदा नदी को स्वयं शक्ति का स्वरूप माना जाता है। यह एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। भेड़ाघाट का योगिनी मंदिर नर्मदा के समीप स्थित है, जो यह दर्शाता है कि नदी और योगिनी साधना के बीच गहरा संबंध रहा होगा। मंदिर के आसपास की संगमरमर चट्टानें प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक वातावरण भी निर्मित करती हैं।

योगिनी मंदिर उस काल के समाज में तांत्रिक परंपरा की स्वीकृति और महत्व को दर्शाता है। यह बताता है कि शक्ति उपासना केवल सीमित वर्ग तक नहीं है, बल्कि व्यापक स्तर पर प्रचलित थी। स्थानीय लोगों में आज भी योगिनी मंदिर से जुड़ी अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। कुछ मानते हैं कि यहाँ 64 योगिनियाँ आज भी अदृश्य रूप में निवास करती हैं।
यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। समय-समय पर इसके संरक्षण और मरम्मत के प्रयास किए जाते हैं। मौसम, पर्यावरण और मानवीय हस्तक्षेप के कारण प्रतिमाओं को नुकसान पहुँचा है। फिर भी यह मंदिर आज भी अपने मूल स्वरूप की झलक देता है।
भेड़ाघाट आने वाले पर्यटक प्रायः धुआंधार जलप्रपात और संगमरमर चट्टानों के साथ-साथ 64 योगिनी मंदिर का भी दर्शन करते हैं। यह स्थान आज भी साधकों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र है, जो तंत्र, शक्ति और योगिनी परंपरा को समझना चाहते हैं।

भेड़ाघाट का 64 योगिनी मंदिर केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं है, बल्कि भारतीय तांत्रिक परंपरा, शक्ति उपासना और स्थापत्य कला का अनमोल प्रतीक है। यह मंदिर उस काल की धार्मिक सोच, नारी शक्ति के सम्मान और आध्यात्मिक खोज की गहराई से परिचित कराता है। नर्मदा की पवित्र धारा, संगमरमर की चट्टानें और योगिनियों की रहस्यमयी उपस्थिति, इन सबका संगम इस मंदिर को एक ऐसा स्थल बनाता है, जहाँ इतिहास, आस्था और रहस्य एक साथ सांस लेते हैं।
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