*विहिप का मौलाना मदनी पर तीखा प्रहार: विनोद बंसल बोले– “कट्टरपंथी मानसिकता को संरक्षण देना बंद करें उलेमा”*

रविंद्र कुमार,संपादक/पटना/नई दिल्ली/31 अगस्त 2026 :: विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना मदनी से जुड़े कथित बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। बंसल ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में धार्मिक पहचान, कट्टरपंथ, हिंसा, राष्ट्रवाद और संविधान में निहित समान अधिकारों को लेकर कई सवाल उठाए हैं।
बंसल ने अपने पोस्ट में सवाल किया कि क्या समाज में नफरत फैलाने, हिंसा करने, आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्त होने अथवा देश-विरोधी गतिविधियों का समर्थन करने वाले लोगों को ही मुस्लिम समाज का प्रतिनिधि मानना उचित है। उन्होंने इस संदर्भ में मौलाना मदनी से आत्ममंथन करने की अपील की।

विहिप प्रवक्ता ने अपने संदेश में मॉब लिंचिंग, बम विस्फोट, आतंकवाद, धार्मिक स्थलों को निशाना बनाए जाने और कथित तौर पर देश-विरोधी गतिविधियों जैसे गंभीर मुद्दों का उल्लेख किया। हालांकि, ये उनके द्वारा लगाए गए राजनीतिक-सामाजिक आरोप हैं; इन्हें किसी पूरे धार्मिक समुदाय के बारे में तथ्यात्मक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।

बंसल ने वंदे मातरम् और भारत माता की जय जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों एवं नारों का भी उल्लेख किया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इनसे दूरी बनाने वाले लोगों को ही मुस्लिम समाज की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

इसी क्रम में उन्होंने संविधान और शरिया कानून के संबंध को लेकर भी सवाल उठाया। बंसल ने कहा कि भारत में नागरिकों के अधिकारों का आधार संविधान है और इसी संदर्भ में उन्होंने समान नागरिक संहिता को लेकर मुस्लिम नेतृत्व के रुख पर प्रश्न खड़ा किया।
अपने पोस्ट में बंसल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी उल्लेख किया। उन्होंने मौलाना मदनी को संघ को करीब से देखने और उसकी विचारधारा को समझने की सलाह देते हुए कहा कि ऐसा करने पर उनके दृष्टिकोण में बदलाव आ सकता है।
विहिप प्रवक्ता ने अंततः देश में एकता, भाईचारे और सभी धर्मों के सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करने के बजाय भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय एकता से जुड़ने की आवश्यकता है।
बंसल का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब धर्म, संविधान, व्यक्तिगत कानून, समान नागरिक संहिता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे लगातार सार्वजनिक एवं राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। उनके बयान ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि धार्मिक समुदायों के भीतर सुधार, कट्टरता के विरोध और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को किस तरह आगे बढ़ाया जाए।

🌹*संपादकीय टिप्पणी*🌹
धार्मिक पहचान नहीं, आचरण होना चाहिए बहस का केंद्र
विनोद बंसल का बयान कई गंभीर सवाल उठाता है, लेकिन ऐसे संवेदनशील विषयों पर सार्वजनिक विमर्श की पहली शर्त यह होनी चाहिए कि किसी व्यक्ति या संगठन के कथित कृत्य को पूरे धार्मिक समुदाय की पहचान न बनाया जाए। आतंकवाद, हिंसा, कट्टरता या देश-विरोधी गतिविधियों का विरोध जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि करोड़ों सामान्य नागरिकों को किसी अपराध या विचारधारा के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार न ठहराया जाए।
संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है और साथ ही कानून के शासन की अपेक्षा भी करता है। इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानून, समान नागरिक संहिता और राष्ट्रीय एकता पर बहस तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों और तर्क के आधार पर होनी चाहिए, न कि सामुदायिक आरोप-प्रत्यारोप के आधार पर।
वास्तविक चुनौती यह है कि हिंदू-मुस्लिम सहित हर समुदाय के भीतर कट्टरता और हिंसा की किसी भी प्रवृत्ति का स्पष्ट विरोध हो तथा शांतिपूर्ण, संवैधानिक और राष्ट्रहितकारी आवाजों को मजबूत किया जाए। भारत की सामाजिक शक्ति उसकी विविधता में है। असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन असहमति को नफरत में बदलने से रोकना हर पक्ष की जिम्मेदारी है।
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