*युग अवसान: रत्नपीठ कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य तरणी कांत राय देव नहीं रहे*

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#न्यूज़हाईलाइट्स:
👍अकादमिक और सामाजिक जगत को अपूरणीय क्षति: 84 वर्ष की आयु में शिक्षाविद तरणी कांत राय देव का निधन।
👍सक्रिय जीवन का पर्याय: अंतिम समय तक समाज और साहित्य के कार्यों में रहे तत्पर।
👍विधायक सहित दिग्गजों ने दी अंतिम विदाई: भकतगांव स्थित आवास पर उमड़ा जनसैलाब।
👍विरासत: धुबरी जिला साहित्य सभा के पूर्व अध्यक्ष और रत्नपीठ कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य के रूप में सदा याद किए जाएंगे।
🌹============================🌹 तिलक चंद्र प्रसाद/ चापर(असम )/, 28 जून 2026 :: पश्चिम असम के प्रबुद्ध समाज और शिक्षा जगत के लिए आज का दिन अत्यंत दुखद है। चापर की माटी के सपूत, धुबरी जिला साहित्य सभा के पूर्व अध्यक्ष और रत्नपीठ कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य तरणी कांत राय देव का बीती रात 11:45 बजे निधन हो गया। वे 84 वर्ष के थे।

स्वर्गीय राय देव केवल एक शिक्षाविद नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी ऊर्जावान शक्ति थे, जिन्होंने अपने 84 वर्षों के जीवन में अनगिनत संस्थानों को सींचा और समाज सेवा को अपना धर्म माना। उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी जीवंतता थी; ढलती उम्र के बावजूद वे किसी युवा की तरह सामाजिक, शैक्षणिक और साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाते थे। उन्होंने मृत्यु के अंतिम दिन तक अपनी सक्रियता को बनाए रखा, जो आज की पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा है।

उनके निधन की सूचना मिलते ही समूचे पश्चिम असम में शोक की लहर दौड़ गई। आज सुबह से ही चापर के भकतगांव स्थित उनके निवास पर उन्हें अंतिम नमन करने वालों का तांता लग गया। 10 नंबर बिलासीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र के विधायक जीवेश राय ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
विधायक ने उनके निधन को क्षेत्र के लिए एक ऐसी रिक्तता बताया, जिसे भरना नामुमकिन है। उनके अंतिम दर्शन के लिए चापर और आस-पास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, छात्र और गणमान्य नागरिक उपस्थित हुए।

🌹*संपादकीय टिप्पणी*🌹
तरणी कांत राय देव का जाना केवल एक व्यक्ति का अवसान नहीं, बल्कि एक युग का अंत है। वे उस पीढ़ी के स्तंभ थे, जिसने संस्थानों को सिर्फ बनाया नहीं, बल्कि उन्हें अपनी आत्मा से पोषित किया। रत्नपीठ कॉलेज की स्थापना और साहित्य सभा में उनका योगदान इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति का दृढ़ संकल्प समाज की दशा और दिशा बदल सकता है। उनकी जीवन-शैली इस बात का जीवंत उदाहरण थी कि ‘सेवा’ के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती। समाज को उनकी कमी सदैव खलेगी।
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