*विश्व हिंदी दिवस पर कविवर सुरेन्द्र नाथ सक्सेना की स्मृति में भव्य काव्य-संध्या, पुस्तकों का लोकार्पण*

*अवसर पर 5 रचनाकारों को ‘सुरेन्द्र नाथ सक्सेना साहित्य सम्मान-2026’, 10 रचनाकारों को ‘सुरेन्द्र नाथ सक्सेना रचनाकार सम्मान-2026’ तथा 3 समीक्षकों को ‘सुरेन्द्र नाथ सक्सेना साहित्य समीक्षा सम्मान-2026’ मिला*
रविंद्र कुमार,संपादक/पटना, 10 जनवरी 2026 :: विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर चित्रगुप्त सामाजिक संस्थान, पटना और श्री साहित्य कुंज, रांची के संयुक्त तत्वावधान में पाटलिपुत्र परिषद, चौक, पटना सिटी में कविवर सुरेन्द्र नाथ सक्सेना की स्मृति में एक भव्य काव्य-संध्या और पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित हुआ।
कविवर के ज्येष्ठ पुत्र तुषार कांति द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में साहित्य प्रेमी, कवि और बड़ी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे। कार्यक्रम में कविवर सुरेन्द्र के काव्य-ग्रंथ ‘विष-बाण’, उनकी सुपुत्री मनीषा सहाय सुमन द्वारा संपादित साहित्य संवाहक पत्रिका का उन पर विशेषांक तथा सुपुत्र पीयूष कांति के ग़ज़ल-संग्रह ‘तिश्नगी रह गई’ का औपचारिक लोकार्पण किया गया।

कविवर के सुपौत्र सार्थक सक्सेना ने उनके काव्य-ग्रंथ ‘दिव्य-लोक’ के प्रथम खंड का संगीतमय पाठ प्रस्तुत किया, जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने की। 
प्रमुख अतिथियों में कमलनयन श्रीवास्तव, मधुरेश शरण, प्रेम किरण, डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, डॉ. आरती, शुभ चंद्र सिन्हा, प्रभात धवन, अनुराधा प्रसाद, नसीम अख्तर, श्वेता ग़ज़ल, सीमा रानी, डॉ. सुनंदा केशरी, सुनील कुमार, डॉ. अनीता राकेश, डॉ. किशोर सिन्हा, गणेश सिन्हा, चित्रगुप्त समाज के अध्यक्ष डॉ. गोलवारा तथा पाटलिपुत्र परिषद के अध्यक्ष शामिल थे।

शायर प्रेम किरण ने बताया कि ‘विष-बाण’ भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्धों की पृष्ठभूमि में रचित वीर-रस प्रधान काव्य-कृति है, जिसका पाठ कविवर ने 1962-67 के दौरान बिहार के तत्कालीन राज्यपाल एम.ए. अयंगार के समक्ष किया था।
श्रोताओं ने इन पंक्तियों की खूब सराहना की:
“धरती का हिम-मंडित मस्तक भर गया आज चित्कारों से
नर-मुंड रक्त की मांग आज आई है प्रबल पहाड़ों से
वीरों की जननी! सावधान! देना है शीश जवानों का
उतरो चंडिके! महाकाली! आ गया वक्त बलिदानों का।”

काव्य-पठन सत्र में पीयूष कांति की ग़ज़ल ‘तिश्नगी रह गई’ के इस शेर को खूब तालियां मिलीं:
“जब सुख़नवर साथ बैठे प्यार की बातें हुईं
दिल में जो थी नफ़रतों की आग पानी हो गई।”

मनीषा सहाय सुमन की पंक्ति “ऐसे शब्द लिखो मेरे मन अब” ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना, मधुरेश शरण, कमलनयन श्रीवास्तव की रचनाओं पर तो श्रोता झूम उठे।
नसीम अख्तर के “गलियों के फूल वक्त के उपवन में आ गये”, शुभ चंद्र सिन्हा के “चरागों को न मेरा घर बताया कर”,

सुनील कुमार मलंग के “टूटे दिल के मेरे अहसास मंजर देखो” तथा सीमा रानी के “जो पास अपने बुलाते ही नहीं” जैसे भावपूर्ण रचनाओं ने समां बांध दिया।

कार्यक्रम के क्लायमेक्स में 5 रचनाकारों को ‘सुरेन्द्र नाथ सक्सेना साहित्य सम्मान-2026’, 10 रचनाकारों को ‘सुरेन्द्र नाथ सक्सेना रचनाकार सम्मान-2026’ तथा 3 समीक्षकों को ‘सुरेन्द्र नाथ सक्सेना साहित्य समीक्षा सम्मान-2026’ प्रदान किया गया।
अंत में..आयोजक तुषार कांति ने सभी का आभार व्यक्त किया और भविष्य में ऐसे आयोजनों को जारी रखने का संकल्प दोहराया।
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