*बड़ा फैसला: ईसाई धर्म अपनाने वालों को नहीं मिलेगा SC आरक्षण का लाभ, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर*

रविंद्र कुमार,संपादक /नई दिल्ली/ 24 मार्च 2026 :: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू धर्म त्यागकर ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) के अंतर्गत मिलने वाले आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभों का हकदार नहीं रहेगा। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि धर्मांतरण के बाद व्यक्ति ‘अनुसूचित जाति’ का सदस्य नहीं रह जाता और उसे SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाला कानूनी संरक्षण भी प्राप्त नहीं होगा।
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*प्रमुख बिंदु (News Highlights)*
*धर्म परिवर्तन और अधिकार*: सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति की श्रेणी से बाहर माना जाएगा।
*SC/ST एक्ट का दायरा*: धर्मांतरित व्यक्ति अब SC/ST एक्ट के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकेगा।
*हाईकोर्ट का फैसला बरकरार*: जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस ए.वी. अंजारिया की पीठ ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मई 2025 के आदेश की पुष्टि की।
*पादरी की अपील खारिज*: यह फैसला पादरी चिंथदा आनंद की उस याचिका पर आया है, जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती दी थी।
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यह कानूनी विवाद पादरी चिंथदा आनंद से जुड़ा है, जिन्होंने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ देने से मना कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पाया था कि चूंकि याचिकाकर्ता ईसाई धर्म का सक्रिय रूप से पालन कर रहा है, इसलिए वह अनुसूचित जाति के समुदाय का हिस्सा नहीं रह सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, अनुसूचित जाति का दर्जा हिंदू समाज की सामाजिक विसंगतियों से जुड़ा है। ईसाई धर्म में धर्मांतरण के बाद, व्यक्ति उस सामाजिक ढांचे से बाहर हो जाता है, जिसके आधार पर आरक्षण और संरक्षण के अधिकार दिए गए हैं.

*विश्व हिंदू परिषद की प्रतिक्रिया*
विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने इस निर्णय का पुरजोर स्वागत किया है। उन्होंने इसे संविधान और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की मूल भावनाओं के अनुरूप बताया।
बिनोद बंसल ने कहा कि:
*”यह निर्णय उन मिशनरियों और ताकतों पर अंकुश लगाएगा जो छल, कपट और प्रलोभन के जरिए SC/ST समाज का धर्मांतरण कराते हैं। अब हमारे दलित भाई-बहनों की गौरवशाली परंपराओं और आस्था के केंद्रों पर होने वाले हमलों पर रोक लग सकेगी।”*
*कानूनी निहितार्थ*
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन लोगों पर सीधा असर पड़ेगा जो दोहरे लाभ (धार्मिक परिवर्तन और जातिगत आरक्षण) का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। यह फैसला भविष्य में धर्मांतरण से जुड़े अन्य कानूनी मामलों के लिए एक नजीर (Precedent) साबित होगा।
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