*भारतीय राजनीति के गिरते स्तर के कड़वे सच का वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार सिंहा द्वारा एक विश्लेषण*

पटना /12 फरवरी, 2026 :: आज के राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरी चिंता व्यक्त करते हुए वरिष्ठ विश्लेषक जितेन्द्र कुमार सिन्हा ने देश की वर्तमान स्थिति को “नैतिक और वैचारिक संकट” का कालखंड बताया है। उनके अनुसार, वर्तमान राजनीति अब सिद्धांतों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि ध्रुवीकरण और सस्ते नारों का बाजार बन गई है।

*आदर्शों का पतन: ‘त्याग’ से ‘वायरल क्लिप’ तक का सफर*
विश्लेषण में इस बात पर जोर दिया गया है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस राजनीति का अर्थ ‘त्याग और दूरदृष्टि’ था, वह आज केवल सोशल मीडिया के ‘सेकेंड्स’ में सिमट गई है।
*रणनीतिक झूठ*: अब झूठ अपवाद नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति बन चुका है।

*डिजिटल हथियार*: गालियों का ट्रेंड होना, अफवाहों का बाजार और संदर्भ से काटे गए बयान आज की राजनीति के नए हथियार हैं।
*सत्य बनाम त्वरित परिणाम: सच जवाबदेही मांगता है, जबकि झूठ भीड़ को तुरंत उकसाने और जवाबदेही से बचने का आसान रास्ता देता है।

*संस्थानों का क्षरण : संसद और मीडिया पर सवाल*
रिपोर्ट के अनुसार, लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं:
*संसद का ‘ड्रामा’*: राष्ट्र की चेतना का केंद्र कही जाने वाली संसद अब नीतिगत बहस के बजाय व्यक्तिगत अपमान और कैमरों के लिए किए जाने वाले ड्रामे का मंच बनती जा रही है।
*मीडिया की भूमिका*: लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ अब सत्ता से प्रश्न पूछने के बजाय ‘प्रेस नोट’ पढ़ने और टीआरपी के लिए पक्ष चुनने में व्यस्त है। ‘ट्रायल से पहले फैसला’ करना नई पत्रकारिता बन गई है।

*विपक्ष की हताशा और ‘अराजकता’ का डर*
लेख में विपक्ष की भूमिका पर भी कड़ा प्रहार किया गया है। जितेन्द्र कुमार सिन्हा का मानना है कि विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा ‘सत्ता-विहीनता’ के कारण हताशा में है।
*संस्थागत अविश्वास*: जब सत्ता हाथ से निकलती दिखती है, तो संस्थाओं और प्रक्रियाओं को अवैध ठहराना लोकतंत्र के लिए घातक है।
*नकारात्मकता का माहौल: वैकल्पिक नीति देने के बजाय केवल अविश्वास और भ्रम फैलाना भविष्य की नींव हिला सकता है।

*इतिहास की निर्मम जांच: एपस्टीन और वैश्विक संकेत*
विश्लेषण एक गंभीर चेतावनी के साथ समाप्त होता है कि सत्ता का अहंकार इतिहास की मार से नहीं बच सकता। ‘एपस्टीन फाइल्स’ और हाल ही में ब्रिटिश पीएम से जुड़ी घटनाओं का जिक्र करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि कोई भी पद इतिहास की जांच से ऊपर नहीं है। आज जो सत्ता और मीडिया के संरक्षण में सुरक्षित हैं, कल उन्हें दस्तावेजों और गवाहियों के सामने जवाबदेह होना ही पड़ेगा।

*निष्कर्ष: सुधार का मार्ग*
राजनीति को फिर से पटरी पर लाने के लिए भाषा का शुद्धिकरण, विचार आधारित विपक्ष, संस्थाओं का सम्मान और जनता की वैचारिक जागरूकता को अनिवार्य बताया गया है। संदेश स्पष्ट है—झूठ की नाव पर सवार लोग याद रखें कि इतिहास का समुद्र बहुत गहरा है और वह कभी किसी को नहीं बख्शता।
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