*विरासत से विकास तक: 114 वर्ष का हुआ गौरवशाली बिहार, 22 मार्च से शुरू होगा तीन दिवसीय महापर्व*

जितेंद्र कुमार सिंहा /पटना /18 मार्च, 2026 :: भारत के मानचित्र पर केवल एक राज्य नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म और लोकतंत्र की जननी के रूप में स्थापित ‘बिहार’ आगामी 22 मार्च को अपनी स्थापना के 114 वर्ष पूरे करने जा रहा है। 1912 में बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग होकर एक स्वतंत्र पहचान बनाने वाला यह प्रदेश आज अपनी ऐतिहासिक स्मृतियों को संजोते हुए आधुनिक विकास की नई गाथा लिख रहा है।
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*न्यूज़ हाइलाइट्स (मुख्य बिंदु)*
*ऐतिहासिक मील का पत्थर: 22 मार्च 1912 को आधिकारिक अधिसूचना के साथ बिहार एक पृथक प्रांत बना।*
*तीन दिवसीय उत्सव: 22 से 24 मार्च तक पटना के गांधी मैदान, श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल और रविंद्र भवन में भव्य कार्यक्रमों का आयोजन।
लोकतंत्र की जननी: विश्व को वैशाली के रूप में पहला गणराज्य देने वाली भूमि का गौरव गान।*
*ज्ञान का केंद्र: नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों की विरासत और आर्यभट्ट व चाणक्य जैसे विद्वानों की जन्मस्थली।*
*धार्मिक संगम: बौद्ध और जैन धर्म के उद्गम स्थल के रूप में वैश्विक पहचान।*
*सांस्कृतिक विविधता: मधुबनी पेंटिंग और मखाना उत्पादन में बिहार का विश्व स्तर पर दबदबा।*
*गौरवशाली बिहार*
1. *गौरवशाली अतीत: 1912 से 2026 तक का सफर*
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में बिहार को अलग प्रांत बनाने की घोषणा हुई थी, जिसे 22 मार्च 1912 को अमली जामा पहनाया गया। शुरुआत में इसमें उड़ीसा भी शामिल था, जो 1936 में अलग हुआ। बाद में 15 नवंबर 2000 को झारखंड के अलग होने के बाद बिहार अपने वर्तमान स्वरूप में आया। “विहार” (बौद्ध मठ) शब्द से उत्पन्न “बिहार” नाम यहाँ की गहरी आध्यात्मिक जड़ों को दर्शाता है।

2. *वैशाली से चंपारण तक: नेतृत्व की भूमि*
बिहार ने हमेशा विश्व को दिशा दी है। जहाँ वैशाली में दुनिया का पहला लोकतंत्र फला-फूला, वहीं मौर्य सम्राट अशोक और चंद्रगुप्त ने अखंड भारत की नींव रखी। आधुनिक इतिहास में 1857 के वीर बाबू कुंवर सिंह का साहस हो या महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह, बिहार भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मुख्य केंद्र रहा है।

3. *आधुनिक आयोजन: उत्सव का स्वरूप*
वर्ष 2026 का बिहार दिवस विशेष होने वाला है। राजधानी पटना के गांधी मैदान में मुख्य समारोह आयोजित होगा, जहाँ बिहार की लोक कलाओं और आधुनिक तकनीकी प्रगति का संगम दिखेगा।
*व्यंजन मेला*: बिहार के प्रसिद्ध जायकों (लिट्टी-चोखा, मखाना व्यंजन) का प्रदर्शन।
*कला प्रदर्शनी*: मधुबनी पेंटिंग और स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा।
*साहित्य व रंगमंच*: राज्य के बौद्धिक गौरव को दर्शाने के लिए पुस्तक मेले और नाटकों का मंचन।

4. *वर्तमान और भविष्य की राह*
114 वर्षों की इस यात्रा में बिहार अब केवल कृषि प्रधान राज्य नहीं रहा। आज यह शिक्षा, आईटी और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के क्षेत्र में तेजी से छलांग लगा रहा है। “बिहार दिवस” इसी संकल्प को दोहराने का दिन है कि कैसे अपनी प्राचीन गरिमा को आधुनिक नवाचारों के साथ जोड़कर एक ‘विकसित बिहार’ का निर्माण किया जाए।

बिहार दिवस महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि करोड़ों बिहारवासियों के आत्मसम्मान और उनकी मेहनत का उत्सव है। यह उत्सव याद दिलाता है कि जिस मिट्टी ने बुद्ध को ज्ञान और सम्राटों को साम्राज्य दिया, वह मिट्टी आज भी असीम संभावनाओं से भरी हुई है।
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