*’अंकों की दौड़’ से ऊपर है जिंदगी: परीक्षा महज एक पड़ाव है, सफलता की आखिरी मंजिल नहीं-विनय श्रीवास्तव*

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*मुख्य संदेश*
*छात्रों के लिए: प्रश्नपत्र आपकी रचनात्मकता और सोच को नहीं माप सकता*
*माता-पिता के लिए: बच्चे का आत्मविश्वास आपके शब्दों से बनता और टूटता है*
*समाज के लिए: सफलता के रास्ते अनेक हैं, केवल डॉक्टर या इंजीनियर बनना ही एकमात्र लक्ष्य नहीं*
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पटना / 16 फरवरी, 2026 :: जैसे-जैसे 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं नजदीक आ रही हैं, घरों के भीतर एक अनकहा तनाव और डर का माहौल गहराने लगा है। इस संवेदनशील माहौल के बीच स्वतंत्र पत्रकार विनय श्रीवास्तव ने एक मार्मिक लेख के जरिए छात्रों और अभिभावकों को जीवन का वास्तविक पाठ पढ़ाया है। उनका कहना है कि परीक्षा केवल योग्यता का एक सीमित पैमाना है, यह किसी बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व या भविष्य का फैसला नहीं कर सकती।
*योग्यता का सीमित आकलन है परीक्षा*
विनय श्रीवास्तव के अनुसार, हर बच्चे की सीखने की गति और रुचि अलग होती है। कोई गणित में निपुण है, तो कोई कला या खेल में। एक ही प्रश्नपत्र से सभी की प्रतिभा को नहीं मापा जा सकता। परीक्षा के समय सबसे बड़ा शत्रु ‘मानसिक तनाव’ है, जो अक्सर याद की हुई चीजों को भी भुला देता है। छात्रों के लिए उनका मूल मंत्र है— शांत रहें और अपनी तैयारी पर भरोसा रखें।

*अभिभावकों की भूमिका: तुलना नहीं, साथ दें*
लेख में अभिभावकों को विशेष नसीहत दी गई है। अक्सर पड़ोसी के बच्चों से तुलना और सामाजिक प्रतिष्ठा का डर बच्चों के मन को कमजोर कर देता है। श्री श्रीवास्तव ने कहा, “बच्चा आपकी प्रतिष्ठा का साधन नहीं है। उसे इस समय आपके दबाव की नहीं, बल्कि आपके प्रेम, धैर्य और भरोसे की जरूरत है।”

*इतिहास से सीख: नंबर नहीं, जुनून दिलाता है सफलता*
सफलता केवल अंकों की मोहताज नहीं होती, इसे सिद्ध करने के लिए लेख में कई महान विभूतियों का उदाहरण दिया गया है:
*सचिन तेंदुलकर*: पढ़ाई में साधारण रहे, लेकिन क्रिकेट के प्रति जुनून ने उन्हें ‘क्रिकेट का भगवान’ बना दिया।

*थॉमस अल्वा एडिसन*: जिन्हें स्कूल से ‘पढ़ने लायक नहीं’ कहकर निकाल दिया गया था, उन्होंने बल्ब का आविष्कार कर दुनिया को रोशन किया।
*अल्बर्ट आइंस्टीन और डॉ. कलाम*: संघर्षों से निकलकर इन्होंने विज्ञान और मानवता को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।

*असफलता अंत नहीं, एक नया मोड़ है*
कम अंक पाने वाले छात्र असफल नहीं होते, बल्कि वे एक अलग रास्ते के राही होते हैं। आज का युग केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं है; कौशल (Skills), मेहनत और सीखने की इच्छा ही असली सफलता की कुंजी है। असली परीक्षा स्कूल के बाद शुरू होती है, जहाँ अंकों से अधिक धैर्य और विवेक की आवश्यकता होती है।

*निष्कर्ष: आत्मविश्वास ही असली पूँजी*
अंत में, विनय श्रीवास्तव ने छात्रों से अपील की है कि वे परीक्षा को सम्मान दें लेकिन उससे डरें नहीं। एक परिणाम पूरी जिंदगी की कहानी नहीं लिख सकता। माता-पिता का एक वाक्य— “हम तुम्हारे साथ हैं”, बच्चे के भीतर फिर से उठ खड़े होने की ताकत भर देता है। याद रखिए, आपकी इंसानियत, सपने और आत्मविश्वास ही आपकी असली पूँजी हैं।
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