September 23, 2026

*डिजिटल युग में मरती संवेदना: जमुई की घटना और हमारी सामूहिक विफलता*

*रविन्द्र कुमार,संपादक,बिहार न्यूज़ 18 द्वारा इस गंभीर विषय पर विस्तृत विश्लेषण*

​बिहार के जमुई में एक नाबालिग छात्रा के साथ हुई दुर्व्यवहार की घटना केवल कानून और व्यवस्था की विफलता भर नहीं है, यह उस समाज का नग्न यथार्थ है जो अपनी संवेदनशीलता खो चुका है। जब किसी मासूम के साथ अपराध होता है, तो पुलिस केस दर्ज करती है, गिरफ्तारियां होती हैं और न्याय की कानूनी प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन जो दाग उसके दामन पर लगता है, उसे मिटाने के लिए कोई कानूनी धारा पर्याप्त नहीं होती। यह घटना सवाल उठाती है कि एक नागरिक के रूप में हम कहाँ खड़े हैं और हमारी नैतिक चेतना किस दिशा में जा रही है।

👍*​वायरल सनसनी की होड़ में कुचली जाती इंसानियत*

​इस पूरी त्रासदी का सबसे वीभत्स और डरावना पहलू वह डिजिटल व्यवहार है जो घटना के बाद सामने आया। इंटरनेट पर रीच, व्यूज़ और फॉलोअर्स की अंधी दौड़ में लोगों ने पीड़िता की लाचारी, उसके दर्द और उसकी पहचान को सरेआम नीलाम कर दिया। किसी नाबालिग पीड़िता का चेहरा बिना ब्लर किए वीडियो वायरल करना केवल एक तकनीकी या कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि यह पीड़िता की निजता और आत्मसम्मान पर किया गया दूसरा प्रहार है।

​जमुई पुलिस का 120 सोशल मीडिया अकाउंट्स पर FIR दर्ज करना और मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार करना निसंदेह एक कड़ा प्रशासनिक संदेश है। पॉक्सो (POCSO) एक्ट और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत बनाई गई SIT से त्वरित जांच की उम्मीद जागी है। परंतु सवाल यह है कि क्या कानून का भय ही हमें संवेदनशील बनाएगा? जब तक समाज का हर व्यक्ति किसी की मजबूरी को ‘कंटेंट’ बनाने की आदत से बाज नहीं आता, तब तक कोई भी डिजिटल स्पेस महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं हो सकता।

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👍*​पीड़ित को कटघरे में खड़ा करने वाली सड़ती मानसिकता*

​हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अपराध घटित होने के बाद हमारी सुई अपराधी के कुकृत्य पर टिकने के बजाय पीड़िता के आचरण पर जाकर अटक जाती है। ‘वह वहाँ क्यों गई थी?’, ‘उसने क्या पहना था?’—ये ऐसे प्रश्न हैं जो अपराधी का हौसला बढ़ाते हैं और पीड़िता को दोबारा सामाजिक अदालत में खड़ा कर देते हैं।

​किसी महिला या बच्ची की गरिमा पर हमला उसकी किसी गलती का परिणाम नहीं, बल्कि अपराधी की विकृत और बीमार मानसिकता का प्रमाण है। जब तक हमारा समाज पीड़िता को सांत्वना और सुरक्षा देने के बजाय उस पर उंगलियाँ उठाता रहेगा, तब तक न्याय का सपना अधूरा ही रहेगा। किसी का दुपट्टा खींच देना या ऑनलाइन उत्पीड़न करना चरित्र पर सवाल खड़े करने का अधिकार किसी को नहीं देता।

 

👍*​साइबर सुरक्षा की हकीकत और तंत्र की जवाबदेही*

​जमुई मामले में पुलिस का त्वरित एक्शन स्वागत योग्य है, लेकिन यह मामला एक और कड़वी सच्चाई को उजागर करता है—साइबर सेल की सुस्त और चुनिंदा कार्यप्रणाली। रोजाना हज़ारों महिलाएँ ऑनलाइन उत्पीड़न, फर्जी आईडी, व्यक्तिगत चरित्र हनन और ब्लैकमेलिंग की शिकार होती हैं। अधिकतर मामलों में शिकायतें फाइलों में धूल फांकती रहती हैं और पीड़ित न्याय के इंतज़ार में थक हार जाता है।

​कानून की सार्थकता इस बात में है कि वह हर पीड़ित के लिए समान रूप से और समयबद्ध तरीके से काम करे। जब तक साइबर सेल और पुलिस प्रशासन त्वरित कार्रवाई को एक स्थायी कार्यसंस्कृति नहीं बनाएँगे, तब तक ऑनलाइन असामाजिक तत्वों का मन बढ़ा रहेगा।

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👍*​जागने का वक्त अब है*

​जमुई की घटना केवल जमुई तक सीमित नहीं है; यह उस आत्ममुग्ध और संवेदनहीन समाज की कहानी है जो दूसरों के आंसुओं में भी अपना मनोरंजन और मुनाफा ढूंढता है। दूसरों की जिंदगी को तबाह करके पाई गई डिजिटल लोकप्रियता न तो पत्रकारिता है, न ही सामाजिक जागरूकता।

​हमें एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ किसी पीड़िता को अपनी पहचान छिपाने के डर से घुटना न पड़े, बल्कि अपराधी को समाज में मुंह छिपाने की जगह न मिले। न्याय केवल अदालत के कमरों से नहीं मिलता; न्याय तब पूरा होता है जब समाज पीड़िता के साथ ढाल बनकर खड़ा होता है और अपराधी को बिना किसी शर्त के धिक्कारता है।

सवाल यह नहीं है कि पुलिस ने कितने लोगों को पकड़ा, असली सवाल यह है कि क्या हम एक इंसान के रूप में जागने को तैयार हैं?

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रविन्द्र कुमार
रविन्द्र कुमार
प्रधान सम्पादक -(www.biharnews18.in)
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