*सत्ता का फूलों का सेज या कांटों भरा ताज : सम्राट की असली अग्निपरीक्षा*
*रविंद्र कुमार,संपादक द्वारा खास विश्लेषण*

बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। सम्राट चौधरी ने सूबे के मुख्यमंत्री के रूप में कमान तो संभाल ली है, लेकिन उनके सामने फूलों की सेज नहीं, बल्कि ‘कांटों का ताज’ है। निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘सुशासन बाबू’ की अपनी छवि को बनाए रखने के लिए अथक प्रयास किए, लेकिन विरासत में मिली चुनौतियां अब सम्राट चौधरी के धैर्य और प्रशासनिक कौशल की असली परीक्षा लेंगी।
**विरासत में मिली जटिल चुनौतियां**
नीतीश कुमार के लंबे कार्यकाल में बिहार ने आधारभूत ढांचे और शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति देखी, लेकिन कुछ बुनियादी समस्याएं आज भी नासूर बनी हुई हैं।

*शराबबंदी का संकट*: कागजों पर सफल दिखने वाली शराबबंदी जमीन पर एक समानांतर अपराध अर्थव्यवस्था खड़ी कर चुकी है। पुलिस और माफिया की कथित साठगांठ इस कानून के उद्देश्य को धूमिल कर रही है।
*जमीन विवाद और अपराध*: बिहार में होने वाली अधिकांश हत्याओं के पीछे जमीन विवाद एक प्रमुख कारण है। बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिंहा को जब भूमि और राजस्व विभाग का जिम्मा सौपा गया, तब विजय सिंह ने किस विभाग में सुधार करने के लिए कुछ कठोर निर्णय लिए जो राजस्व विभाग के पदाधिकारी एवं कर्मचारियों को नागवार गुजरा, और वे लोग पिछले कई सप्ताह से हड़ताल पर रहे, विजय सिंहा जी जाते-जाते 41 अंचलाधिकारियों को सस्पेंड कर दिया, यह भी एक बड़ी समस्या है जिसका सामना उनको करना पड़ सकता है.

*पुलिस की गिरती साख*: पुलिस की गिरती साख और बढ़ती डकैती, लूट, तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों ने जनता के मन में असुरक्षा का भाव पैदा किया है।
*बेलगाम नौकरशाही*: राज्य में ‘अफसरशाही’ का बोलबाला जगजाहिर है। जनप्रतिनिधियों की बातों को दरकिनार करना और फाइलों का दफ्तरों में अटकना अब एक आम शिकायत बन चुकी है।
*बेरोजगारी और एक करोड़ नौकरियों का बोझ*: निवर्तमान मुख्यमंत्री ने अगले 5 सालों में 1 करोड़ नौकरियां देने का जो ‘मेगा प्रॉमिस’ किया है, वह अब सम्राट चौधरी के गले की फांस बन सकता है। बिहार जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य में इतने बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के लिए भारी निवेश और औद्योगिक क्रांति की जरूरत है। क्या सम्राट इस चुनावी वादे को जमीन पर उतार पाएंगे या यह सिर्फ एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा? बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं की नजरें अब सीधे नए मुख्यमंत्री पर टिकी हैं।
*अपनों की बेरुखी*: सत्ता की राह में सम्राट के लिए सबसे बड़ा कांटा बाहर नहीं, बल्कि घर के भीतर ही है। एनडीए में सब कुछ ठीक नहीं दिख रहा। भाजपा और जदयू के भीतर एक ऐसा धड़ा है जो सम्राट चौधरी को नेतृत्व सौंपे जाने से असहज है। पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा का हालिया बयान इस कड़वाहट की तस्दीक करता है। अपनों को साधकर चलना और सहयोगियों का विश्वास जीतना सम्राट के लिए सरकार चलाने से भी मुश्किल काम साबित होने वाला है।
*जनादेश का सवाल*: पिछले विधानसभा चुनाव में जनादेश तकनीकी रूप से नीतीश कुमार के चेहरे और उनके काम पर मिला था। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार की जनता नीतीश की जगह सम्राट चौधरी को उसी सहजता से स्वीकार करेगी? एक अनुभवी चेहरे की जगह एक नए नेतृत्व को स्वीकार करना जनता के लिए आसान नहीं होता। सम्राट को कम समय में खुद को ‘जनता का नेता’ साबित करना होगा, वरना सत्ता की वैधता पर सवाल उठते रहेंगे।
*डॉक्टरों में असंतोष की भावना*: सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक के फरमान ने स्वास्थ्य विभाग में बग़ावत की स्थिति पैदा कर दी है.नीतीश कुमार जाते-जाते सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक का जो आदेश दे गए हैं, उसने स्वास्थ्य महकमे में हलचल मचा दी है। डॉक्टरों का संभावित विरोध और स्वास्थ्य सेवाओं का चरमराना सम्राट के लिए तात्कालिक संकट बन सकता है।
**एक्शन मोड:उम्मीद की किरण या महज औपचारिकता?**
मुख्यमंत्री का पद संभालते ही सम्राट चौधरी ने जिस तरह आला अधिकारियों के साथ बैठक की और ‘जीरो टॉलरेंस’ की चेतावनी दी, उससे उनके इरादे साफ हैं। “कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी” का संदेश कड़ा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह तंत्र रातों-रात बदल जाएगा?
बिहार का प्रशासनिक ढांचा दशकों से एक ही ढर्रे पर चल रहा है। अधिकारियों की मनमानी को लगाम देना सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। क्या पुलिस प्रशासन अपनी खोई हुई साख वापस पा सकेगा? क्या थानों में आम आदमी की सुनवाई बिना ‘पहुंच’ या ‘पैसे’ के हो पाएगी?

*आगे की राह: कथनी और करनी का मिलन*
पहला,सम्राट चौधरी एक जुझारू नेता माने जाते हैं, लेकिन संगठन चलाना और सरकार चलाना दो अलग-अलग ध्रुव हैं। उनके सामने पहली चुनौती तो यह है कि वह उन अधिकारियों में खौफ पैदा करें जो अब तक खुद को जवाबदेही से ऊपर समझते रहे हैं।
दूसरा, उन्हें गठबंधन की राजनीति और प्रशासनिक सुधारों के बीच एक सूक्ष्म संतुलन साधना होगा। अगर वह अपराध पर लगाम लगाने और जमीन विवादों के निपटारे के लिए कोई ठोस ‘स्पीडी ट्रायल’ मैकेनिज्म ला पाते हैं, तो यह उनकी पहली बड़ी जीत होगी।
तीसरा,इसके साथ ही, अफसरशाही की मनमानी और पुलिस की गिरती साख को सुधारना उनकी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए।

*संपादकीय निष्कर्ष*
सम्राट चौधरी के सिर पर जो ताज सजा है, उसकी चमक तभी बरकरार रहेगी जब वह इन कांटों से कुशलतापूर्वक निपटेंगे। उन्हें न केवल विपक्ष से लड़ना है, बल्कि अपनी ही गठबंधन सरकार के भीतर उठते असंतोष के सुरों को भी शांत करना है। बिहार की जनता आज उम्मीद और आशंका के दोराहे पर खड़ी है। सम्राट के सिर पर सजे इस ताज की चमक तभी बढ़ेगी, जब उसकी चुभन अधिकारियों को महसूस हो और उसकी राहत आम आदमी के दरवाजे तक पहुंचे।
सम्राट चौधरी अपनी इस अग्निपरीक्षा में कितना सफल होंगे, यह आने वाला वक्त और बिहार की जागरूक जनता तय करेगी।
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