*बिहार के हक की हुंकार: सांसद संजय यादव ने केंद्र से मांगा ₹1,79,900 करोड़ का लंबित पैकेज*
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#मुख्यसमाचार(Highlights)
*ऐतिहासिक मांग*: राज्यसभा सांसद संजय यादव ने आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के दौरान बिहार के लिए 26 साल पुराने लंबित वित्तीय पैकेज का मुद्दा उठाया।
*TDP से तुलना*: जेडीयू सांसदों को आंध्र प्रदेश की तर्ज पर केंद्र से राज्य का हक छीनने की दी सलाह।
*वादाखिलाफी का आरोप*: कहा कि 2000 के पुनर्गठन अधिनियम में क्षतिपूर्ति का वादा था, जो 21 साल की एनडीए सरकार के बावजूद अधूरा है।
*जनमत संग्रह की मांग*: राज्य पुनर्गठन संशोधनों के लिए जनमत संग्रह को आधार बनाने का सुझाव दिया।
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रविंद्र कुमार,संपादक/नई दिल्ली/पटना/04 अप्रैल 2026 :: राज्यसभा सांसद श्री संजय यादव ने संसद के उच्च सदन में बिहार के अधिकारों को लेकर पुरजोर आवाज उठाई है। आंध्र प्रदेश पुनर्गठन संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान उन्होंने केंद्र की एनडीए सरकार को बिहार के साथ हुई ऐतिहासिक वादाखिलाफी की याद दिलाई। सांसद ने मांग की कि बिहार बंटवारे के समय तय किए गए 1,79,900 करोड़ रुपये के विशेष वित्तीय पैकेज को अविलंब जारी किया जाए।

*ऐतिहासिक संदर्भ और वादाखिलाफी*
संजय यादव ने सदन को याद दिलाया कि 25 अप्रैल 2000 को बिहार पुनर्गठन अधिनियम पर हुई चर्चा के दौरान तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने बिहार की क्षतिपूर्ति के लिए विशेष वित्तीय प्रबंध का भरोसा दिया था। उन्होंने कहा कि उस समय राजद अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादव और तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती राबड़ी देवी ने इस पैकेज की मांग की थी, जिसे कांग्रेस, वामपंथी दलों और यहाँ तक कि नीतीश कुमार की तत्कालीन समता पार्टी का भी समर्थन प्राप्त था।

*TDP बनाम JDU: राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल*
सांसद ने बिहार के एनडीए सांसदों, विशेषकर जेडीयू पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि उन्हें आंध्र प्रदेश की TDP से सीखना चाहिए। उन्होंने कहा, “TDP ने पिछले दो वर्षों में अपने राज्य के लिए 2 लाख करोड़ से अधिक की सहायता और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट सुनिश्चित किए हैं। इसके उलट बिहार के सांसदों को महज एक ‘मखाना बोर्ड’ देकर बहला दिया गया है।

*महंगाई और वर्तमान प्रासंगिकता*
संजय यादव ने तर्क दिया कि सन 2000 में जो मांग 1.79 लाख करोड़ की थी, आज मुद्रास्फीति (Inflation) के कारण उसका मूल्य कहीं अधिक बढ़ चुका है। उन्होंने जेडीयू को आगाह किया कि वे अपने राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल बिहार के इस हक को दिलाने में करें, क्योंकि अब तो राज्य में मुख्यमंत्री के पद को लेकर भी अस्थिरता के संकेत मिल रहे हैं।

*स्थायित्व के लिए जनमत संग्रह जरूरी*
विधेयक पर अपनी बात समाप्त करते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य पुनर्गठन कानून में किसी भी संशोधन का आधार ‘जनमत संग्रह’ होना चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भविष्य में सत्ता परिवर्तन के साथ राजधानियों और सीमाओं को लेकर बार-बार संशोधन होते रहेंगे, जिससे लोकतांत्रिक ढांचा प्रभावित होगा।
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